Sunday, September 14, 2014

मुसीबत गुर्बतों की, वो काली रात बदले।

नयी गजल

मुसीबत गुर्बतों की, वो काली रात बदले।
फकत नारों की झूठी,सियासी बात बदले।

सिकायत इस व्यवस्था, से मेरी यूं नहीं है।
मै ऐसा सोचता हुं, कि ये हालात बदले ।

तरक्की चाहिये तो, तरक्की किजिये न।
गरीबी न भी बदले, तो इसकी जात बदले।

अगर ये हो सका तो, बदलना है इसे भी।
मै हिन्दू तू मुसलमां, ये ही जज्बात बदले।

मेरी जिन्दादिली ने, कहा इक दिन तङप के।
कयामत तू नहीं तो, तेरी औकात बदले।

मुझे मालूम है ये, तू सुनता है सभी की।
खुदाया और नहीं कुछ, तो ये हयात बदले।

राजीव कुमार

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