गजल पेश ए खिदमत तवज्जो तलब ___________
तेरे सर पर कोई इल्जाम रक्खा जायेगा इक दिन।
तू इन्सां है करम तेरा भी देखा जायेगा इक दिन।
गुनाहों के सिंघासन पर हैं बैठे बादशाह जितने
उन्हें मालूम हो उनको उतारा जायेगा इक दिन
परिन्दे भी निकल आयें हैं अब ये फैसला करके ।
इन्हीं पिजङों में सैय्यादो को पकङा जायेगा इक दिन।
रहम की भीख मांगेगा समंदर चीख कर मुझसे।
मेरा गुस्सा मेरे बाहर अगर आ जायेगा इक दिन।
अभी जिन्दा हुं इस बुनियाद पर उम्मिद करता हुं।
किला फिरका परस्ती का गिराया जायेगा इक दिन/
दिया जलता हुआ कहने लगा मुझसे मेरे यारों ।
कोई माने न माने ये अंधेरा जायेगा इक दिन ।
राजीव कुमार
तेरे सर पर कोई इल्जाम रक्खा जायेगा इक दिन।
तू इन्सां है करम तेरा भी देखा जायेगा इक दिन।
गुनाहों के सिंघासन पर हैं बैठे बादशाह जितने
उन्हें मालूम हो उनको उतारा जायेगा इक दिन
परिन्दे भी निकल आयें हैं अब ये फैसला करके ।
इन्हीं पिजङों में सैय्यादो को पकङा जायेगा इक दिन।
रहम की भीख मांगेगा समंदर चीख कर मुझसे।
मेरा गुस्सा मेरे बाहर अगर आ जायेगा इक दिन।
अभी जिन्दा हुं इस बुनियाद पर उम्मिद करता हुं।
किला फिरका परस्ती का गिराया जायेगा इक दिन/
दिया जलता हुआ कहने लगा मुझसे मेरे यारों ।
कोई माने न माने ये अंधेरा जायेगा इक दिन ।
राजीव कुमार
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