Tuesday, April 8, 2014

उम्र का साथ भी इक पल में बिछड़ जाता है

उम्र का साथ भी इक पल में बिछड़ जाता है
रिश्ता बुनियाद से कमजोर उखड जाता है

बात तो हद से गुजरती है तब की जब वो भी
मेरी खुशियों को देख मुझपे बिगड़  जाता है

कितने पैबन्द लगे हैं वफ़ा के कपड़ों में
बस नुमाइश ही करें तो भी उधड़ जाता है

जिंदगी रोज ही लड़ती है जिन्दा रहने को
हर बुरे दौर का किस्सा भी पिछड़ जाता है

शक़ के फितरत की बीमारी की अब दवा ले लो
खांसते खांसते सीना ये जकड जाता है

आज ही कर लो अभी कर लो इस मोहोब्बत को
मौत के बाद तो ये जिश्म अकड़ जाता है

उनका पत्थर है दिल तो ये भी हकीकत है की
कुंवे की रस्सी से पत्थर भी रगड़ जाता है

यूँ ही बदनाम सियासत को न करो कोई  
मुल्क बनता है सियासत से बिगड़ जाता है

राजीव कुमार 

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