एक।कता
कुछ भरोसा हमको भी जीने की खातिर दीजिये।
ऐसे ही जीना हे तो हमको भी खंजर दीजिये।
मांग कर खाने की तो फितरत हमारी थी मगर।
मार कर खाने की खातिर एक पत्थर दीजीये
राजीव कुमार
ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...
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