Sunday, September 14, 2014

मंजर-ए-आम के हल्के कलाम कहता हुं।

मंजर-ए-आम के हल्के कलाम कहता हुं।
मैं इन अश्कों को निगाहों के जाम कहता हुं।

ये महज लफ्जों में उलझे हुए अशआर नहीं।
मैं फसानों की हकीकत तमाम कहता हुं।

कुछ ख्यालों से तो जज्बात छलकते हैं मगर
कुछ ख्यालों को मैं तेरा ईनाम कहता हुं।

ये अकीदत है इबादत है या कुछ और बता
मैं हुं नादान, तू ही है ईमाम कहता हुं।

कल तलक आफताब तुझसे रश्क करता था।
आज महताब है तेरा गुलाम कहता हुं।

मुझको मजबूर न कर सच बयान करने को।
तू ही खुद सोच मै क्या क्या हराम कहता हुं।

सब सुखनवर हैं यहां मेरे मै सभी का हुं ।
महफिले शायरी तुझको सलाम कहता हुं।

राजीव कुमार

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