शहर ए उल्फत के बदनाम मुहल्लों में रहा।
सच्चा आशिक था मगर नाम निठल्लों में रहा।
हुस्न को दे के नवाजा था हमनें हुस्ने नजर।
कोई पूछे क्यु गूरूर उनका दूतल्लों में रहा ।
लोग कैसे जाने ये इश्क छुपा लेते है।
इश्क मेरा तो जमाने के हूहल्लो में रहा।
राजीव कुमार
सच्चा आशिक था मगर नाम निठल्लों में रहा।
हुस्न को दे के नवाजा था हमनें हुस्ने नजर।
कोई पूछे क्यु गूरूर उनका दूतल्लों में रहा ।
लोग कैसे जाने ये इश्क छुपा लेते है।
इश्क मेरा तो जमाने के हूहल्लो में रहा।
राजीव कुमार
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