Friday, July 25, 2014

शहर ए उल्फत के बदनाम मुहल्लों में रहा।

शहर ए उल्फत के बदनाम मुहल्लों में रहा।
सच्चा आशिक था मगर नाम निठल्लों में रहा।

हुस्न को दे के नवाजा था हमनें हुस्ने नजर।
कोई पूछे क्यु गूरूर उनका दूतल्लों में रहा ।

लोग कैसे जाने ये इश्क छुपा लेते है।
इश्क मेरा तो जमाने के हूहल्लो में रहा।

राजीव कुमार

No comments:

Post a Comment

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...