Monday, December 1, 2014

हुआ सख्त है तब बगावत का लहजा।

उन्वान पर कोशिश

हुआ सख्त है तब बगावत का लहजा।
तिजारत बनी जब हूकूमत का लहजा।

जूबां पे नफासत मगर दिल में शोले ।
यही आजकल है सियासत का लहजा ।

वही जूर्म सारे अदालत वही हैं।
सभी को पता है वकालत का लहजा

तरक्की के इस दौर की है हकीकत।
सदाकत नहीं है सदाकत का लहजा ।

सिखाया नहीं बैर मजहब ने तो फिर।
है क्यूं हर किसी का अदावत का लहजा।

जरूर एक दिन आयेंगे अच्छे दिन भी ।
मगर पहले सीखो मुहब्बत का लहजा ।

राजीव कुमार

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