Friday, July 25, 2014

वो खयाल आंखो मे रात दिन कोई ख्वाब बन के अभी भी है।

दोस्तो ये गजल आप सभी के हवाले ----------

वो खयाल आंखो मे रात दिन कोई ख्वाब बन के अभी भी है।
वो जो आग सीने में थी कभी, वो चिराग बन के अभी भी है

जहां बारिसों का न नाम था जहां रेत उङती थी हर जगह॥
उसी दिल में जब से रहे हो तुम, वो गुलाब बन के अभी भी है

कहां दर्द कितना मिला मुझे कहां कुछ भी मुझको मिला नहीं।
ये हसीन किस्सा है प्यार का जो हिसाब बन के अभी भी है ॥

कभी दिल्लगी के लिहाज से कोई वक्त मुझको भी दिजिये।
मेरी महफिलें में गजल नहीं वो शराब बन के अभी भी है॥

मेरा हाल ए दिल मेरी हर ग़ज़ल मेरी जिन्दगी के हसीन पल॥
मैं नया लिखुं भी तो क्या लिखुं वो किताब बन के अभी भी है।

राजीव कुमार

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