Monday, October 13, 2014

हर एक शै में इक कमी क्युं है।

नयी गजल अभी अभी______
हर एक शै में इक कमी क्युं है।
इसी का नाम जिन्दगी क्युं है।

जुदाई गम की खुश्क रातें है।
सुबह मगर ये शबनमी क्युं है।

मुकाबले में आज इन्सां के।
उसी की सारी बुजदिली क्युं है।

खुदा तू जानता तो होगा ही ।
जुदा मुझी से हर खुशी क्युं है।

हमारे गर्दिशों के किस्सों में।
हर इक दफा ही बेबसी क्युं है।

फसल जो अम्न की उगाते है।
उन्ही के घर में खुदखुशी क्युं है।

हमारे शहर के चिरागों से ।
खफा खफा ये रौशनी क्युं है।

सजा तो खुद ब खुद मुहब्बत है।
जमाने भर को दुश्मनी क्युं है।

यही है रंग तेरी महफिल का।
सभी में इतनी बेखुदी क्युं है।

सवाल भी तेरा ये कैसा है।
तुझी से इतनी दिल्लगी क्युं है।

मुझे पता है जानता है तू।
तेरे लिये ही आशिकी क्युं है।

राजीव कुमार

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