Sunday, March 2, 2014

मोहब्बत के मुक़दमे में खरा मुझको उतरना है

दोस्तों पेश है ताज़ा तरीन ग़ज़ल _________

मोहब्बत के मुक़दमे में खरा मुझको उतरना है 
मुअक्किल है मेरा ये दिल सवालों से उबरना है 

वफ़ा का जुर्म है अपना जमानत हो न पायेगी 
अदालत है ज़माने की गवाहों को मुकरना है 

दलीलें बे बे अशर होंगे कई इलज़ाम हैं मुझ पर 
सिकायत है जिन्हे मुझसे उन्हें इंसाफ करना है 

सजा देना तो दे देना मगर मुझको बता देना
मेरी यादों के किस्सों को कहाँ पर जा के मरना है

मेरे मुंसफ दो मोहलत फिर सम्भालूँ मैं मेरे दिल को
बहुत से हादसों को फिर मेरे दिल से गुजरना है

कचहरी कायदे कानून मुझसे सब खफा हैं क्यूँ
मोहब्बत के परिंदों के परों को फिर कतरना है

राजीव कुमार

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