Thursday, March 27, 2014

दिल में उनको रखा ये खता क्या हुई,

दिल में उनको रखा ये खता क्या हुई,
इक दिया इन निगाहों में जलने लगा/
उनकी उल्फत में हम क्या कहें क्या हुआ,
इश्क़ भी मोम जैसे पिघलने लगा/

बारिशें सहमी सहमी बरसती रहीं,
बिजलियाँ अपने धुन पर गरजती रहीं/
ये फिज़ा ये हवा सब खफा हो गये.
इस चमन का बदन भी  बदलने लगा/

रौशनी अब अंधेरों को मिलती नहीं,
आशिक़ों का है क्या कुछ नहीं कुछ नहीं/
जिश्म अपना नहीं रूह अपनी नहीं,
ख्वाहिशों का भी दम यूँ निकलने लगा/

ये जमाना पुराना फ़साना रहा,
फिर भी ये दिल दीवाना दीवाना रहा /
मंजिलें  रूठती मुस्कुराती रहीं,
उनके जानिब मगर दिल भी चलने लगा/

इम्तहां इश्क़ की और कितनी सहें
कुछ बताओ कहाँ और किससे कहें
ख्वाब भी रात को अब सताने लगे
जां तड़पने लगी जी मचलने लगा/

राजीव कुमार 

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