Monday, October 13, 2014

समंदर है कोई सहरा नहीं है।

गजल आप की मोहब्बतों की तालिब ___________

समंदर है कोई सहरा नहीं है।
ये मेरा दिल तेरे जैसा नहीं है।

कली तितली बहारें बाग है पर ।
मेरा मन भी कोई भौरा नहीं है।

हसीं यादें तेरी तन्हाईयों में ।
मुझे कहतीं है तू तन्हा नहीं है।

तेरी हर बेरुखी में थी मुहब्बत।
तभी मुझको कोई सिकवा नहीं है।

तुझे चाहुं मै कितना सोचता हुं।
सिवा इसके कोई चारा नहीं है।

जमाने का अगर है डर तो आजा।
खुवाबो पर कोई पहरा नहीं है।

बदलते वक्त ने बदला नहीं कुछ।
हमारे बीच क्या रिश्ता नहीं है।

है तुझसे रूह का रिस्ता तभी तो।
तुझे खोने का भी खतरा नहीं है।

यही सब कुछ तो रहता है जहन में
दिवाना दिल मगर कहता नहीं है।

राजीव कुमार

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