नज्म
होश रखना है तो,
ए मेरे हमनशी,
बेखुदि अपने दिल में ही रक्खा करो।
थोङा बहके रहो,
थोङा सुलझे रहो,
मयकशी अपने दिल में ही रक्खा करो।
बज्म ए उल्फत
को रौशन बनाउंगा मै।
सोचता था कि दिल को जलाउंगा मै।
फिर चिरागों ने मुझसे ,
लिपट के कहा।
आशिकी अपने दिल में ही रक्खा करो।
ये वही मोङ है,
ये वही है डगर,
इस डगर से जरा तू सम्भल के गुजर।
इक मुसाफिर को
रस्ते बताते रहे।
रहबरी अपने दिल में ही रक्खा करो।
राजीव कुमार
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