Saturday, January 4, 2014

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है। तुम्हारे शह्र में हमको शराफत मार जाती है ।

ग़ज़ल

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।
तुम्हारे  शह्र में हमको  शराफत मार जाती है ।

मसाइल में घिरी रहती है सबकी ज़िंदगी लेकिन ।
हुनर, औकात से ज्यादा की चाहत मार जाती है।

गले मिलते हैं होली पर ज़हन में ईद को रख कर।
ये रिश्ते यूँ नहीं मरते सियासत मार जाती है।

किसी भी मुल्क़ की ताकत वहाँ तालीम है यारों।
हो गर बुनियाद कच्ची तो ईमारत मार जाती है ।

हम अपने दुश्मनों के हाथ से मरते नहीं लेकिन ।
हमे फिरका परस्ती की विरासत मार जाती है।

राजीव कुमार

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