Saturday, November 1, 2014

जिन्दगी को भला और क्या चाहिये।

गजल आप की मोहब्बतों के हवाले---

जिन्दगी को भला और क्या चाहिये।
आग पानी जमीं औ हवा चाहिये।

छूट जायेगा सब कुछ यहां एक दिन।
हमको दौलत नहीं अब दुआ चाहिये।

हस्र है एक जैसा सभी का यहां।
आखिरी में सभी को खुदा चाहिये।

जो मय्यसर नहीं हो सका है कभी।
आशिकों को वही हर दफा चाहिये।

इश्क होता नहीं है फकत हुस्न से।
थोङी शर्मो हया कुछ अदा चाहिये।

सिर्फ मेहनत से मिलती नहीं नौकरी।
इसमें किस्मत भी तो मरहबा चाहिये।

बात हक की जबां से न कहना कोई ।
हुक्मरानों को बस इक खता चाहिये।

बह रहा है लहू रोज क्यूं हर कहीं।
ये भी इंसान को सोचना चाहिये।

शायरी कुछ ख्यालों से होती नहीं।
दिल में सैलाब उठता हुआ चाहिये

मरे दुश्मन भी कहने लगे आज कल।
दिल तेरे जैसा हमको बङा चाहिये।

रंजो गम झूठ नफरत बहुत हो चुका ।
इस जहॉ को जहां दूसरा चाहिये।

राजीव कुमार

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