कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं
हम उनकी आहटों को आज भी पायल समझते है
वो झुकती हर नज़र थी तीर अब तलवार हैं यादें
हमे अब लोग भी हारा हुआ घायल समझते है
लकीरें उसके चेहरे की अभी खामोश हैं शायद
छलकते अश्क़ न बोले मगर काज़ल समझते है
यक़ीनन दिल के दरवाजे को वो भी खोल ही देगा
के आशिक़ कब ज़माने को कोई हायल समझते है
मुझे रुशवाईयों से अब जरा भी डर नहीं लगता
मेरे मेहबूब ही मुझको कोई पागल समझते है
हायल - बाधक
राजीव कुमार
हम उनकी आहटों को आज भी पायल समझते है
वो झुकती हर नज़र थी तीर अब तलवार हैं यादें
हमे अब लोग भी हारा हुआ घायल समझते है
लकीरें उसके चेहरे की अभी खामोश हैं शायद
छलकते अश्क़ न बोले मगर काज़ल समझते है
यक़ीनन दिल के दरवाजे को वो भी खोल ही देगा
के आशिक़ कब ज़माने को कोई हायल समझते है
मुझे रुशवाईयों से अब जरा भी डर नहीं लगता
मेरे मेहबूब ही मुझको कोई पागल समझते है
हायल - बाधक
राजीव कुमार
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