Thursday, March 27, 2014

कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं

कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं
हम उनकी आहटों को आज भी पायल समझते है

वो झुकती हर नज़र थी तीर अब तलवार हैं यादें
हमे अब लोग भी हारा हुआ घायल समझते है

लकीरें उसके चेहरे की अभी खामोश हैं शायद
छलकते अश्क़ न बोले मगर काज़ल समझते है

यक़ीनन दिल के दरवाजे को वो भी खोल ही देगा
के आशिक़ कब ज़माने को कोई हायल समझते है

मुझे रुशवाईयों से अब जरा भी डर नहीं लगता
मेरे मेहबूब ही मुझको कोई पागल समझते है

हायल - बाधक

राजीव कुमार

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