Wednesday, November 12, 2014

दस्त दरिया फूल सबनम और सहरा हो गया।


दस्त दरिया फूल सबनम और सहरा हो गया।
आसमां में मैं ख्यालों का परिंदा हो गया।

लोग दौलत को जहां में क्या खुदा कहने लगे।
सबकी आंखों में खुदा का अक्स पैसा हो गया ।

देखने निकला मै जब इन्सानियत की शक्ल को।
मेरे भीतर का भी इक इंसान रुस्वा हो गया।

क्या गजब लिक्खा है मजहब की किताबों में बता
या बता दे शह्र में क्युं आज दंगा हो गया ।

माल ओ जर रोटी थी या खानाबदोशी जिन्दगी।
आखरी में दरअसल सब एक किस्सा हो गया।

जब फकीरी छोङ कर ये बादशाहत थाम ली।
तब मेरा किरदार ऊचां हो के बौना हो गया।

इश्क भी दिलचस्प है हो कर कभी छुपता नहीं।
क्या पङा उल्फत में मैं दुनिया में बलवा हो गया ।

राजीव कुमार

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