रोज हमें अखबार दिखाते खून सने किरदार नये।
वही पुरानी तस्वीरों में दिखते अत्याचार नये।
मांग रहे हैं चाय बेचते भीख मांगते ये बच्चे।
हमें चाहिये हमें दिजीये, शिक्षा के औजार नये।
लाल बत्तियों की ललकारें लोकतंत्र की हाहाकारें।
संविधान कुछ इसी तरह से करता है चित्कार नये।
पेङो पर लटकी, कुछ मानवता की लाशे कहती है।
व्यर्थ ढूंढना है ऐसे में जीवन के आधार नये।
नहीं सुरक्षित सङक, बच्चियां कोख में सहमी सहमी हैं
आने वाली नयी त्रासदी के हैं ये आसार नये।
इस समाज को जात पात की टुटी किश्ती ढोती है।
और गरीबी को वादों के मिलते है बस यार नये।
सत्य अहिंसा के रखवालों की रखवाली ऐसी है।
सिर्फ सिंहांसन के खातिर ही जलते हैं घरबार नये।
गूंगी जनता बहरा राजा और चुनाव का बाजा है।
भ्रष्ट व्यवस्था को ऐसे ही मिलते है सरदार नये।
राजीव कुमार
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