Sunday, December 23, 2018

ज़ोर ज़ुल्मत बेनियाज़ी हर बला आबाद है।

ज़ोर ज़ुल्मत बेनियाज़ी हर बला आबाद है।
यूं समझिये शह्र का रहबर ही अब सय्याद है।

हर बुलंदी बक्श देता है ख़ुदा उस शख़्स को।
जो अना की क़ैद से पूरी तरह आज़ाद है।

इक मुसलसल इम्तिहां है ज़िन्दगी का सिलसिला।
फ़लसफ़ा-ए-ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी के बाद है।

इसलिये हमने भुला दी है जहां से दुश्मनी।
आप भी सब भूल जाओगे अभी जो याद है।

गर्दिश ए उल्फ़त है मेरा लुत्फ़ ए रगबत दोस्तों।
कौन कहता है कि राजू इश्क़ में बर्बाद है

राजीव कुमार

जो मिल सकी न वही इक ख़ुशी है और मैं हूँ।

जो मिल सकी न वही इक ख़ुशी है और मैं हूँ।
तेरा ख़याल है इक तिश्नगी है और मैं हूँ

बिछड़ते वक़्त मिले थे जहाँ वहीं अबतक
रुकी रुकी सी अभी ज़िन्दगी है और मैं हूँ

न जाने कौन सी शय की तलाश है मुझको
बस इक हयात है आवारगी है और मैं हूँ

मै जब भी देखता हूं आईना तो लगता है
मेरे ही सामने इक अजनबी है और मैं हूँ

जहाँ से आ रही हैं सिसकियों की आवाजें।
उसी मुक़ाम पर अब शाइरी है और मैं हूं

राजीव कुमार

स्याह शब को हसीं दर पे रख के आया हूँ

स्याह शब  को हसीं दर पे रख के आया हूँ
सहर को ओस की चादर पे रख के आया हूँ।

वो इक परिंदा जो भटका हुआ था सुब्ह से
मै आज शाम उसे घर पे रख के आया हूँ

ग़ज़ल के शेर ये नज्में ये दिल की वीरानी।
जो बुझ गया उसी मंज़र पे रख के आया हूँ

हर एक याद हर ख़याल इक हसीं दुनिया ।
तुम्हारे ख़्वाब के बिस्तर पे रख के आया हूँ

मुझे यकीन महब्बत पे था तभी शायद ।
मैं दिल को आप के खंजर पे रख के आया हूँ

क़िताब मेज घड़ी और घर की दीवारें।
मैं अपना सारा जहां घर पे रख के आया हूँ

राजीव कुमार

Sunday, November 18, 2018

शह्र ए दिल्ली में है जो पी एम टू

ग़ज़ल

शह्र ए दिल्ली में है जो पी एम टू
सबकी सांसों में  है वो पी एम टू

गर ज़मीं पर रही तो मिट्टी है
घूल बन कर उड़ी तो पी एम टू

यूँ  हवाओं पे  है धुआँ हावी
इन हवाओं को बोलो पी एम टू।

एक सी एम है एक पी एम है।
मिल के बनते हैं दोनो पी एम टू।

फेफड़े चीखने लगे है पर
रात दिन पी रहे हो पी एम टू।

सारे चैनल पे सिर्फ पी एम है।
फिर भी दिखता है हमको पी एम टू।

राजीव कुमार

छोड़ के जब भी घर जाते हैं

छोड़ के जब भी घर जाते हैं
हमको तन्हा कर जाते हैं

सोच रहा हूं शाम ढले तो
बेघर लोग किधर जाते है।

पैर के छाले देख के अब तो
राह के ठोकर डर जाते हैं

आप के हाथों के ये पत्थर
मेरे ही क्यूँ सर जाते हैं

वो हंसते है देख के हमको।
हम ये देख के मर जाते हैं

इश्क नहीं आसान है लेकिन
करने वाले कर जाते हैं

राजीव कुमार

उल्फत में किसी का भी भला हो नहीं रहा

*ग़ज़ल*
2 2 1 1/2 2 1 1/2 2 12/ 12

उल्फत में किसी का भी भला हो नहीं रहा।
इस काम  में अब और  नफा हो  नहीं रहा।

ग़म इसका नहीं शामो सहर पी रहे हैं हम।
इस बात का  है ग़म कि  नशा हो नहीं रहा।

इस दौर  में सब  झूठ के ही  साथ  हैं खड़े।
सच बोल कर किसी का भला हो नही रहा।

ये देख के  आना पड़ा  खुद  के ही  सामने।
कोई   मेरे   खिलाफ़  खङा  हो  नहीं  रहा।

वहशत  गुनाह  जुल्म  कज़ा  और साज़िशें।
दिल्ली  तेरे  निज़ाम  में  क्या  हो  नहीं रहा।

कुछ काम खुद भी आप मियां कर लिया करो।
हर   बात पे  कहते  हो  चचा  हो  नहीं  रहा।

अब   सोचता  हूँ  छोड़  दूं  ये   शेरो  शाइरी।
कोई  भी  शेर  आज   मेरा   हो  नहीं  रहा।

राजीव कुमार

ऐसा लगता था बचा लेगा मगर ले डूबा।

ग़ज़ल

ऐसा लगता था बचा लेगा मगर ले डूबा।
मुझको ख़ाली पड़ा वीरान सा घर ले डूबा।

फिर वही रात वही ख़्वाब वही तन्हाई ।
मेरी आंखों को इसी बात का डर ले डूबा।
 
एक मंज़िल जिसे पाने की हसीं ख़्वाहिश में
इस जवानी को जवानी का सफ़र ले ढूबा

आपको चाहते रहने के सुकूं को जांना।
आप से दूर हो जाने का असर ले डूबा ।

आज सूरज ने शरारत भी कुछ ऐसे की।
सुब्ह उगते ही सितारों का क़मर ले ढूबा।

इस हकीकत को कोई कैसे छुपा सकता है ।
जिसका फल खाया वही पेड़ बश़र ले ढूबा

राजीव कुमार

Thursday, November 1, 2018

मेरे दिल में उतर कर आज तक देखा नहीं तुमने।

ग़ज़ल

मेरे दिल में उतर कर आज तक देखा नहीं तुमने।
समन्दर की उदासी का सबब जाना नहीं तुमने

बहुत से फ़ैसले बाक़ी हैं क़िस्मत के तुम्हारे भी।
मैं जो भी खो चुका हुं वो अभी खोया नहीं तुमने।

मुझे कुछ भी नहीं हासिल हुआ उल्फ़त कि दुनिया में।
तुम्हें कुछ तो मिला होगा कभी बोला नहीं तुमने।

सँभलने के लिये पीता तो शायद जी नहीं पाता।
बहकने का मज़ा लोगों कभी समझा नहीं तुमने ।

हुआ ज़ख़्मी जिगर कैसे लगे ये चोट कब मुझको
कोई चाक़ू छुरी ख़ंजर कभी मारा नहीं तुमने ।

मैं अक्सर चाँद-तारों से तुम्हारा ज़िक्र करता हूँ ।
शबेग़म में कभी मुझको किया तन्हा नहीं तुमने।

मुहब्बत फूल से भौरे की है बस प्यास बुझने तक।
गुज़रती क्या है फूलों पर कभी सोचा नहीं तुमने।

हमेशा गर्दिशे अय्याम में जीना पड़ा लेकिन।
ख़ुदाया साथ मेरा भी कभी छोड़ नहीं तुमने ।

मुहब्बत की लड़ाई का ज़ुदा  दस्तूर है थोड़ा।
नहीं दिल जीत सकते हो जो दिल हारा नहीं तुमने।

राजीव कुमार

Wednesday, October 31, 2018

हसी लबों को निगाहों को आब दे जाओ

ग़ज़ल फिलबदीह

हंसी लबों पे निगाहों में ताब दे जाओ
हमारे चेहरे को अपना नक़ाब दे जाओ

हों जिसमें दर्ज ज़माने के रंजोग़म सारे
कोई मुझे भी इक ऐसी क़िताब दे जाओ

कहाँ  चले हो सवालों के साथ तुम अपने
मेरा सवाल का पहले जवाब दे जाओ

ख़ुशी मलाल मलामत घुटन परेशानी
जो आप चाहो वो हमको जनाब दे जाओ

तुम्हारे ख़्वाब ही माँगे थे अपनी आँखों में
ये कब कहा था कि झेलम चिनाब दे जाओ

अँधेरा दिल से मिटाने को ए मिरे मालिक।
हर एक दिल को  नया आफ़ताब दे जाओ

मैं चाहता हूं ख़्यालों में आज आ कर तुम।
गजल को अपने लबों का  गुलाब दे जाओ।

राजीव कुमार

Sunday, October 28, 2018

कुछ ऐसा उससे बंधन हो गया है

फिलबदीह ग़ज़ल

कुछ ऐसा उससे बंधन हो गया है
वो मेरे दिल की धड़कन हो गया है

तसव्वुर उसका इक मुस्कान बन के
 मेरे चेहरे का चंदन हो गया है

जो मेरी माँ की हाथों में कभी था
वही अब उसका कंगन हो गया है

बिछड़ के मुझसे अब मेरे लिये वो
मेरी आँखों का सावन हो गया है

चमन एहसास का बन कर के वो ही
मेरे ख़्वाहिश का उपवन हो गया है

नज़र जब से मिलीं हैं उससे तब से
मेरी ख़ातिर वो उलझन हो गया है

राजीव कुमार 😊😊😊

Tuesday, October 23, 2018

ये जो हर रोज़ पल पल देखते हो

हज़ल

ये जो हर रोज़ पल पल देखते हो
बताओ क्यूँ मुसलसल देखते हो।🤔

मैं हर दिन प्राईम टाईम देखता हूँ।
मगर तुम लोग दंगल देखते हो 🤔

फ़क़त हिन्दू मुसलमां ही करोगे।
अगर तुम न्यूज़ चैनल देखते हो 🤔

मियां जम्हूरियत के नाम पर तुम
अबे क्यूँ रोज दलदल देखते हो ।😂

तुम्हे चेहरे की रंगत चाहिये थी
सो तुम चेहरा ही केवल देखते हो।😐

वही क्या अब भी भाषण दे रहा है।
जिसे तुम होके पागल देखते हो।😎

राजीव कुमार

पुर कैफ़ दिल-फ़रोश सा मौसम जरूर है

ग़ज़ल

पुर कैफ़ दिल-फ़रोश सा मौसम जरूर है
ऐसे में तू नहीं है तेरा  ग़म ज़रूर है

महरूम दौलतों से भी हो कर है ये ख़ुशी
माँगा था जैसा वैसा ही हमदम ज़रूर है

शब और सहर जुदा तो हैं इक दूसरे से ,पर
दोनो के लब पे देखिये शबनम ज़रूर है

दामन पे जिनके दाग़ लहू के हैं उनके ही
हाथों में अम्नोचैन का परचम ज़रूर है।

भीतर भटक रही हैं जो वीरानियाँ मेरे।
शह्र ए ख़ुलूस में कहीं मातम ज़रूर है।

जिस तरह ज़िन्दगी के लिये मौत है इलाज
वैसे हर एक दर्द का मरहम ज़रूर है

कोई भी ख़ुश नहीं  है ज़माने में दोस्तों 
हर एक को कोई न कोई ग़म ज़रूर है

राजीव कुमार

Sunday, October 21, 2018

दिल की गहराइयों में जाना है।

फ़िलबदीह  ग़ज़ल

दिल की गहराइयों में जाना है।
फ़िक्र  का दायरा बड़ाना है।

धूप झुलसायेगी बदन लेकिन।
ओस को धूप में नहाना है

साँस दर साँस है कहानी जो।
मौत के बाद वो फ़साना है

दिल के दरिया के इक तलातुम में।
प्यार को डूब कर ही पाना है

आपको अक़्ल क्यूँ नहीं आती
आप से तंग ये ज़माना है।

जिनकी बीनाई छीन ली उनको
रोज इक ख़्वाब भी दिखाना है

एक ही शर्त है मुहब्बत की।
चोट खा कर भी मुस्कुराना है।

ज़िन्दगी क्या है कुछ नहीं भाई
जिस्म को आग में जलाना है

आप जैसा महल नहीं लेकिन
इक मेरा भी ग़रीबख़ाना है

बज़्म-ए-चाहत का आसमां देखो
चाँद-तारों का शामियाना है ।

चाँद को देख कर समझ आया
आसमां पर तेरा ठिकाना है

मेरे आँगन में पेड़ बरगद का
कितनी चिड़ियों का आशियाना है

मेरे क़िस्से में तेरे क़िस्से सा
इक दिवानी है इक दिवाना है

शाइरी और कुछ नहीं यारों
ये हकीकत है या फ़साना है

राजीव कुमार

Saturday, October 20, 2018

क्या बतायें कि क्या नहीं करते।

ग़ज़ल

क्या बतायें कि क्या नहीं करते।
आप से बस गिला नहीं करते।

रूठना मानना दगा करना
इश्क में लोग क्या नहीं करते ।

हां महब्बत के मसअले में तो।
हम किसी का कहा नहीं करते

वो भी हमसे वफा नहीं करती
हम भी उससे वफा नहीं करते

ऐसी दुनिया का क्या करूं जिसमें
लोग मर कर जिया नहीं करते

इश्क में सोचते नहीं 'राजू'
इश्क करते हैं या नहीं करते

Rajeev Kumar

दिल में जो है वो मिटेगा तो मिटेगा रावण।

ग़ज़ल
दिल में जो  है वो मिटेगा तो  मिटेगा रावण।
कब तलक सिर्फ यूं पुतलों में जलेगा रावण।

राम आयेगे   न   आयेगी   हकूमत  उनकी।
कौन  कहता  है कि इक  रोज मरेगा रावण।

आग  दुनिया को  लगाते हैं  वही आज होंगे।
उनके   हाथों  से  जलेगा तो  हसेगा  रावण।

रंज है जुल्म है लालच है दिलों  में जब तक
किसको लगता है कि लंका में रहेगा रावण।

जिसको  मरना  ही  नहीं है  वो  मरेगा कैसे।
आज इस बात को हम सबसे कहेगा रावण।
                              राजीव कुमार

Saturday, October 13, 2018

लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था

ग़ज़ल

लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था
दुनिया मिरे लिये थी मगर इक वही न था।

हैरत मुझे भी आज कल इस बात का है की
दिल उससे ही लगाया जो दिल से सही न था

मुश्किल भरे सफर में हमेशा हमारे साथ
देखा जो मुड़ के दोस्तों पीछे कोई न था

उसकी हर एक दीद से होता था ख़ुश मगर।
वो एक शक्स ही मेरी ख़ातिर ख़ुशी न था

ठुकरा रहा हूं देखिये हर इक सवाल को
इतना ज़हीन आज से पहले कभी न था

पीने लगा है आदमी का आदमी लहू
ऐसा तो यार आदमी पहले कभी न था

राजीव कुमार

Friday, October 12, 2018

गांव से आकर शहर में ये मुझे अक्सर लगा

 ग़ज़ल

गांव से आकर शहर में ये मुझे अक्सर लगा
सच कहूं तो बोलती लाशों से मुझको डर लगा ।

हो कोई ऐसा भी पहलू जिन्दगी का इस तरह ।
हम जिसे जी कर कहें कि आज कुछ बेहतर लगा

हू ब हू मुझसा था लेकिन था जरा मुझसे अलग।
आईने में अक्स मेरा ही मुझे पत्थर लगा

हो मुखालिफ आजकल क्युं दोस्ती के दोस्तों।
पीठ पर क्या आप के भी है कोई खंजर लगा ।

ये हुआ हासिल वफा की राह पर चल कर हमें ।
हर किसी के हाथ का पत्थर हमारे सर लगा ।

लूट लेता है वही इस मुल्क को बतलाओ क्युं।
जो हमे और आप को इस मुल्क का रहबर लगा।

राजीव कुमार

Tuesday, October 9, 2018

जबसे दिल में उतर गयी गंगा

ग़ज़ल

जबसे दिल में उतर गयी गंगा
मैल सब मन के हर गयी गंगा

घर से निकला तो मां की आंखों में
मैने देखा बिखर गयी गंगा।

सिर्फ पानी नहीं ये बोतल में।
बनके तहजीब घर गयी गंगा ।

उसकी दुनिया बदल गयी देखो
जिस जमीं जिस नगर गयी गंगा

अपने बेटों के खेत में जा कर
 पेट दुनिया का भर गयी गंगा

कूङे कचरे से और सीवर से
ऐसा लगता है मर गयी गंगा

हम न संम्भले तो अपनी नस्लों से
क्या कहेंगे किधर गयी गंगा।

राजीव कुमार

ये उसका फन है कि सच्चाई छीन लेता है

ग़ज़ल

ये उसका फन है कि सच्चाई छीन लेता है
वो ख़्वाब देता है बीनाई छीन लेता है

ये सोच कर ही उसे याद मैं नहीं करता।
वो याद आते ही तन्हाई छीन लेता है

न बद गुमान हो सूरज की दोस्ती पर तू।
ये शाम होते ही परछाई छीन लेता है

जो अपनी जात से बाहर निकल नहीं पाता
वो अपने आप की ऊँचाई छीन लेता है

हमेशा देखा है हद से जियाद: पैसा भी।
कमाने वाले की दानाई छीन लेता है।

इसी लिये तो किनारा किया ज़माने से ।
बुराई दे के ये अच्छाई छीन लेता है।

राजीव कुमार

बीनाई - आंख की रौशनी
दानाई - बुद्धीमानी

Tuesday, October 2, 2018

सबकी हंसी ख़ुशी की दुवा करते रहेंगे।

ग़ज़ल

सबकी हंसी ख़ुशी की दुवा करते रहेंगे।
हम फ़र्ज दोस्ती का अदा करते रहेंगे।

जिस तरह वफ़ा तुमने निभाई है जाने जा
थोङा बहुत तो हम भी दगा करते रहेंगे।

मरने के बाद कौन सुनेगा मलामतें।
हम भी कोई न कोई खता करते रहेंगे।

चाहत वफायें दीन धरम और आशिकी।
हर इक ज़ह्र का हम भी नशा करते रहेंगे।

जिद्दी था बहुत मानता नहीं था मर गया।
कहता था महब्बत तो चचा करते रहेंगे।

घर बार काम धाम दोस्त और शाइरी
सब रोल ज़िन्दगी में अदा करते रहेंगे।

राजीव कुमार

Thursday, September 27, 2018

किसी के कहने में सुनने में यार थोङी हूं।

ग़ज़ल

किसी के कहने में सुनने में यार थोङी हूं।
मेरे खिलाफ कोई भी नहीं है मैं ही हूं।

वही हवस है वही वहशतें वही लालच।
मैं आदमी हूं मगर आदमी भी वहसी हूं।

मिरी उङान से गुमराह तुम नहीं होना।
मै आसमान में उङते हुए भी मिट्टी हूं।

मेरे ख़याल मेरी वुसअतों से हैं बाहर
कोई न समझे मैं अपने बदन का कैदी हूँ

ये लोग जश्न मनाते हैं रोज क्युं आखिर।
मरा नहीं हूं अभी तक मैं सिर्फ जख्मी हूं।

खुशी मिलेगी नहीं तुमको जीत कर मुझसे।
मै जीतने का नहीं हारने का आदी हूं।

हमारा दिल ही नहीं जान-वान सब ले लो।
मगर कभी तो कहो जान मैं तुम्हारी हूं।

राजीव कुमार

वुसअतों - फैलाव

Sunday, September 23, 2018

रंग नज़ाकत हुस्न की चाहत का उन्वान महब्बत है

ग़ज़ल

रंग नज़ाकत हुस्न की चाहत का उन्वान महब्बत है
इसका मतलब सबके भीतर का शैतान महब्बत है

वहसत तङपन राहत हिम्मत कभी कभी तो पागलपन।
अच्छा अच्छा समझ गया मैं ये सामान महब्बत है

अश्क खमोशी शोर तबाही एक मुसलसल बर्बादी।
यारों सबकी जान को आफत ये तूफान महब्बत है

दिल की चोरी जान पे कब्ज़ा नींद उङा लेने वाला
लोग समझते मुझको पर ये शैतान महब्बत है

उम्र की बंदिश शर्म की सरहद इसको कुछ मालूम नहीं
रंज हिकारत और मलामत से अन्जान महब्बत है।

मयखाने में शाम को साकी और हमारा टूटा दिल।
हम जैसों की ख़ातिर शायद जीवनदान महब्बत है

छोङ दिये है इस दुनिया में जिसने मज़हब जात अना।
सच कहता हूं यार कसम से वो ईन्सान महब्बत है

मीर कबीर या ग़ालिब दिनकर इनको पढ़कर देख तो लो।
तुम्हीं कहोगे लिखने वालों का भगवान महब्बत है

राजीव कुमार

Monday, September 17, 2018

भूखें हैं लोग इनके निवाले कहां गये।

ग़ज़ल

भूखें हैं लोग इनके निवाले कहां गये।
ऐसे सवाल पूछने वाले कहां गये।

सब ठीक हो गया तो बदन कह के रो पङा।
सीने के ज़ख्म पांव के छाले कहां गये ।

अब तक जो तीरगी के मुक़ाबिल रहे यहाँ
जाने वो रोशनी के रिसाले कहाँ गये

सच लिखने बोलने की रवायत को छोङ कर।
अपने कलम के सच्चे जियाले कहाँ गये।

हावी हैं नफरतों का अंधेरा दिलों पे क्युं।
दिल से महब्बतों के उजाले कहां गये।

राजीव कुमार

जियाले- brave
रासाले -squad of soldiers

Monday, September 10, 2018

किस्से को मैं किताब की दुनिया में ले चलूं।

ग़ज़ल

किस्से को मैं किताब की दुनिया में ले चलूं।
अश्कों को इन्कलाब की दुनिया में ले चलूं।

खुद को तुम्हारे ख्वाब की दुनिया मे ले चलूं
जुगनू को आफताब की दुनिया में ले चलूं

तुझको तेरे सवाल पर कितना यकीन है।
आ चल तुझे जवाब की दुनिया में ले चलूं  ।

उनके दयारे लब से चुरा कर कुछ एक बूंद
शबनम को अब गुलाब की दुनिया में ले चलूं

बतलाउंगा तुम्हे भी बुरा क्या है क्या भला।
खुद को तो इन्तेखाब की दुनिया में ले चलूं

चेहरा तुम्हारा देख के आता है ये ख्याल
तुमको भी माहताब की दुनिया मे ले चलूं।

सिद्दत की तिश्नगी को दिखाउगां साथ आ।
दरया तुझे सराब की दुनिया मे ले चलूँ।

किस्सा ए जिन्दगी है सिफ़र से सिफ़र तलक
सांसों को किस हिसाब की दुनिया में ले चलूं

राजीव कुमार

Tuesday, September 4, 2018

रूह बन कर जिस्म में जो मोजिजा मौजूद है।

ग़ज़ल

रूह बन कर जिस्म में जो मोजिजा मौजूद है।
अस्ल में हर शक्स के भीतर खुदा मौजूद है ।

इक महब्बत की कहानी इक मुसलसल आशिकी
मिट गये है लोग लेकिन आगरा मौजूद है।

चाहतों को दफ्न करके क्या मिला कुछ भी नहीं।
आज भी दिल में किसी का मकबरा मौजूद है।

इक सिवा खुद के सभी को देखता है दोस्तों
हर किसी की आंख में वो आईना मौजूद है

लोग कहते हैं हमारे दर्द को सुनने के बाद।
मसखरे की शक्ल में इक गमजदा मौजूद है।

जानवर इन्सां परिन्दे फूल पत्ते तितलियां।
हर किसी में शाइरी का सिलसिला मौजूद है।

राजीव कुमार

Tuesday, August 28, 2018

जाहिल है नामुराद है शौकीन भी है दिल।

ग़ज़ल

जाहिल है नामुराद है शौकीन भी है दिल।
यानी कि हर हिसाब से रंगीन भी है दिल।

तुझसे बिछङ के आज भी ज़िन्दा हूं किस तरह
जाना इसी ख़याल से गमगीन भी है दिल।

पहले था पुरखुलूश  मगर आशिकी के बाद ।
वहसी है बद मिज़ाज है बे- दीन भी है दिल ।

यूं तो हर इक लिहाज से कङवी है जिन्दगी
लेकिन किसी की याद से नमकीन भी है दिल

अब दौरे आशिकी में शबे हिज्र के लिये
बिस्तर है इक किताब है माजीन भी है दिल

इसके लिये नहीं हैं ये दुनिया के कायदे।
मुल्जिम है खुद गवाह है आईन भी है दिल।

किस चीज से बना है कोई जानता है क्या।
आतिश है ज़ाफ़रान है संगीन भी है दिल

राजीव कुमार

माजीन- गर्म कम्बल
आईन- संविधान कानून
ज़ाफ़रान- केसर।
आतिश - अग्नि
संगीन- पत्थर का बना

Monday, August 20, 2018

कभी ये शीशा बना और कभी बना पत्थर।

कभी ये शीशा बना और कभी बना पत्थर।
धङकता रहता हे सीने में इक पङा पत्थर

हर एक ज़ख़्म यही कहके रोता रहता है
दवा तलाश रहा था मगर मिला पत्थर।

वफा की राह में सब अपने सामने होगे।
ये जान कर ही तो सीने पे रख लिया पत्थर

लगी जो पांव से ठोकर तो हमने ये देखा
सिसक रहा था अकेले पङा पङा पत्थर

अजीब है कि सभी आईने के हक में हैं।
किसी ने पूछा नहीं किसलिए चला पत्थर

तू किस जवाब की ख़ातिर सवाल करता है
ये जान कर भी यहां पर है देवता पत्थर

वफ़ा ख़ुलूस इबादत हो चाहें चारागरी
हर एक राह में हमको फ़क़त मिला पत्थर।

राजीव कुमार 🙂

Sunday, August 19, 2018

फिर कैसे उसको भायेगा संसार का मजा। वो जिसने ले लिया है हरिद्वार का मजा

ग़ज़ल

फिर कैसे उसको भायेगा संसार का मज़ा।
वो जिसने ले लिया है हरिद्वार का मज़ा।

एक बार बदगुमानी जो आ जाये दरमियाँ
आता नहीं है प्यार में भी प्यार का मज़ा।

इक ओर जानो दिल है तो इक ओर नौकरी
लेता हूँ साथ फूलों के मैं ख़ार का मज़ा।

थोङा हुनर के साथ सलीका भी लाईये।
फिर देखियेग दर्द के इज़हार का मज़ा

किसको गरज़ है आज किसानों के दर्द से
हावी है हुक्मरान पे दरबार का मज़ा।

बेशक़ है खुशगवार ये दिन आप का मगर
मज़दूर से न पूछिये इतवार का मज़ा

दुनिया इबादतें ये महब्बत हर एक शै।
जिस तरह चाहे लीजिये संसार का मज़ा

प्याला शराब और शायरी की इक क़िताब।
लेते हैं आओ दोस्तों अशआर का मज़ा।

कंधे पे किसी और के आने से पहले आप।
इक बार ख़ुद ही ले लो हरिद्वार का मज़ा

राजीव कुमार
हरिद्वार

Saturday, August 18, 2018

ये भूल जा मेरी दस्तार गिरने वाली है।

ग़ज़ल

ये भूल जा मेरी दस्तार गिरने वाली है।
न ये गिरी थी न इस बार गिरने वाली है

ये बात तय है कि इक रोज इस जवानी की।
हर एक तौर से रफ्तार गिरने वाली है।

लहू बदन से निकलने लगा तो याद आया।
ये चीज जिस्म से बेकार गिरने वाली है

इसी लिये तो बुलंदी भी छोङ दी हमने
सुना है अज़मते कोहसार गिरने वाली है

हमारा सर है सलामत अभी तलक लेकिन
तुम्हारे हाथ से तलवार गिरने वाली है

अब और आप रुपये को गिरा नहीं सकते।
अब आप ही की ये सरकार गिरने वाली है।

राजीव कुमार
राजीव कुमार

Friday, August 17, 2018

हर एक दर्द मिटा दे हो इक ख़ुशी ऐसी।

आज का हासिल @⁨Harish Darvesh Ji⁩ जी को समिक्षार्थ प्रेषित

हर एक दर्द मिटा दे हो इक ख़ुशी ऐसी।
ख़ुदा करे कि मिले सबको बेहतरी ऐसी।

वो खाक होके अभी तक है ज़हन में ज़िन्दा,
कभी न देखी थी मैने भी ज़िन्दगी ऐसी

कहीं न पीने लगे जह्र जाम के बदले
तुम्हारे बाद न हो जाये तिश्नगी ऐसी।

बुझा के ख़ुद को ज़माने को कर गया रौशन
 किसी चिराग़ मे देखी न रोशनी ऐसी

न ख़ुद को पा ही सके और न हो सके उसके
न पूछो कैसे गुज़ारी है  ज़िन्दग़ी ऐसी।

वो मिलना जुलना वो बातें वो रूठना हसना।
न होगी और किसी से ये दिल्लगी ऐसी

हर एक शख़्स किसे के लहू का प्यासा है
बताउं 🙂किसने मचाई है खलबली ऐसी।

हम और आप न संम्भले तो देखना इक दिन
ज़मीं को आग लगा देगी रहबरी ऐसी

हर एक शख़्स उसे कह के मां बुलाता है
हमारे शह्र में बहती है इक नदी ऐसी

जो दिल से होते हुए रूह में उतर जाए
कहाँ मिलेगी बताओ सुख़नवरी ऐसी।

राजीव कुमार
हरिद्वार 

Wednesday, August 15, 2018

हमारे दम से हासिल वो जो तख्तो ताज़ करता है।

ग़ज़ल

हमारे दम से हासिल वो जो तख्तो ताज़ करता है।
वही तो बाद में हम सबको बे आवाज़ करता है

अगर सब ठीक है तो अस्ल कीमत क्या है राफेल की।
यही वो प्रश्न है जिसको नजर अंदाज़ करता है

नये भारत में जो अखबार सच को छाप दे वो ही।
बङे साहब को नाहक ही बहुत नाराज़ करता है

हमारे टेक्स के पैसे से उङने का मजा है क्या।
वही जाने जो एयर इण्डिया परवाज़ करता है

हमारी सरहदों से रोज लाशें आ रहीं है अब
हमारा शाह आखिर कौन सा ऐजाज़ करता है

वो जो करते नहीं कुछ भी वही हैं बोलते ज्यादा।
वगरना करने वाले का करम आवाज़ करता है।

तेरी तकरीर अच्छी है मगर ये याद भी रखना।
कभी रोटी के बदले काम क्या अल्फाज़ करता है

यही ज़म्हूरियत का अब नया दस्तूर है इसमें
किसी को हम हमें कोई नज़रअंदाज़ करता है

राजीव 🙂🙏

Tuesday, August 14, 2018

हर सहर धूप मेरे घर पे ठहर जाती है

हर सहर धूप मेरे घर पे ठहर जाती है
ओस को ओढ़ के आंगन में बिखर जाती है

शब ए फुर्कत में मेरे साथ मेरी तन्हाई
ख्वाब बन कर मेरी आंखों में संवर जाती है।

उसके लिक्खे हुए खत आज भी जब पढता हूं
एक खुश्बू सी मेरे घर मे बिखर जाती है

खुद से मिलने का करूं कैसे इरादा यारों।
ऐसा करने में तो इक उम्र गुजर जाती है।

ये तसव्वुर का असर है या महब्बत तुसझे।
तेरी सूरत मेरी ग़ज़लों में उतर जाती है।

राजीव कुमार

Sunday, August 12, 2018

फिक्र को इख्तियार मिल जाये।

फिलबदीह ग़ज़ल

फिक्र को इख्तियार मिल जाये।
हमको उनका दयार मिल जाये।

दिल की दुनिया तबाह भी कर ली।
दिल को शायद करार मिल जाये।

मेरी चाहत की तर्जुमानी को।
इक हसीं कोहसार मिल जाये।

जंग जारी है आज तक खुद से।
खुद पे अब इख्तेयार मिल जाये

चांद तारों से हमको क्या लेना।
इनसे बेहतर है यार मिल जाये।

दर्द बे शक हजार मिल जायें।

  • फिर भी ख्वाहिश है प्यार मिल जाये


राजीव कुमार

Saturday, August 11, 2018

है नशे का असर जवानी पर।

है नशे का असर जवानी पर।
लोग रोयेगे इस कहानी पर।

है ये दौलत तो आनी जानी पर
फिर भी हावी है हर कहानी पर

लोग दुश्वार कर न दें जीना।
आप को हमको हक बयानी पर

लिक्खी जायेंगी एक दिन नज्मे।
देखना अपनी जिन्दगानी पर

कोट टाई लगा के लङते हैं
लोग धोती औ शेरवानी पर

अपनी हालत बिगाङ ली हमने।
तेरी चाहत की नातवानी पर

कामयाबी गिरा भी सकती है
गर न काबू रखा रवानी पर

इक दफा इश्क तो करो माहिर
आग देखोगे तुम भी पानी पर

राजीव कुमार

बनाके शाम को हम भी गुलाब देखते हैं

बनाके शाम को हम भी गुलाब देखते हैं
हटाओ अश्क की बातें शराब देखते हैं

अब अपना जख्म किसी को नहीं दिखायेगे
ये सारे लोग हमी को खराब देखते हैं

हम ही को सारे ज़माने की फ़िक्र  है वर्ना
सुना है लोग बस अपना हिसाब देखते हैं

सियासी लोग हमारे दिनों को बदलेंगे।
हम आप दिन में मुंगेरी का ख्वाब देखते हैं

वो जिनके ख्वाब उन्हे सोने तक नहीं देते
उन्हीं को लोग यहां कामयाब देखते हैं

ये जान कर भी वही शक्स एक कातिल है
उसी में लोग मगर इन्तेखाब देखते हैं

इसी लिये तो मुकद्दर से वास्ता तोङा
हम अपने दम पे ही अपना जवाब देखते है।

राजीव कुमार

Wednesday, August 8, 2018

महताब की चमक लगे बेकार की चमक।

ग़ज़ल-2

महताब की चमक लगे बेकार की चमक।
जब देखता हूं आप के रुख्सार की चमक।

हर एक जख्म मेरा चमकने लगा है अब।
कम हो गयी है आप की तलवार की चमक

आंखों को इन्तजार की भट्टी में झोक कर
हम चाहते हैं आप के दीदार की चमक

कहना वो आप का कि नहीं जी अभी नहीं
इनकार में है आप के इकरार की चमक।

दिल के मरीज जबसे महब्बत में हो गये।
दिखने लगी है दोस्तो अशआर की चमक।

हुस्नो हया की बात से लबरेज है गजल।
खुद बोलते हैं शेर मेरे यार की चमक।

राजीव कुमार

मैं सोचता हूं देख के अखबार की चमक।

ग़ज़ल -1

मैं सोचता हूं देख के अखबार की चमक।
कम हो गयी है कितनी सरोकार की चमक।

दंगे फसाद खून खाराबे के दौर में।
गुम हो न जाये आप की सरकार की चमक

इस दौर में किसान के हक के सवाल पर।
फीकी हुई है हर दफा बाजार की चमक।

इक दिन किताब और कलम से ये नौनीहाल
कर देंगे खत्म देखना हथियार की चमक

ले आओ थोङी नर्मियां लहजे में दोस्तो।
बङने लगेगी आप की गुफ्तार की चमक

दौलत की रौशनी भी चमकदार है मगर
हर इक चमक पे भारी है किरदार की चमक

राजीव कुमार

जमाना जिसको कह रहा है कि खुदा है वो।

जमाना जिसको कह रहा है कि खुदा है वो।
न जाने कौन सी दुनिया में रह रहा है वो

हमारे दिल मे अभी तक है एक खालीपन।
के जबसे घर से हमारे निकल गया है वो

मुझे यकीन था आयेगा पर नहीं आया।
मुझे लगा ही नहीं इस कदर खफा है वो

मेरे बगैर कोई काम कर नहीं पाता।
मेरे खिलाफ हमेशा मगर रहा है वो

अजीब शक्स है इस दौर में भी देखो तो
हमारे हाल पे हम सा ही गमजदा है वो।

राजीव

Saturday, August 4, 2018

तुम्हारे रुख का ये चिलमन जरूर महकेगा।


तुम्हारे रुख का ये चिलमन जरूर महकेगा।
खिलेंगे फूल तो गुलशन जरूर महकेगा

बहुत ही प्यार से पहना रहे है हम देखो।
तुम्हारे हाथ में कंगन जरूर महकेगा।

हमारे सामने बे नूर  लग रहा है पर।
तुम्हारे सामने दरपन जरूर महकेगा।

ये सोच कर ही अना हमने छोङ दी यारों।
हमारे नाम  से दुश्मन जरूर महकेगा।

है इक बुजूर्ग की कुर्सी औ नीम की छाया
हमारे घर का भी आंगन जरूर महकेगा।

वो अपने यार वो बारिस वो शायरी अपनी
हां अबके बार भी सावन जरूर महकेगा।

राजीव कुमार

Tuesday, July 31, 2018

मेरे ख्वाबों में मेरे साथ में तुम

मेरे ख्वाबों में मेरे साथ में तुम
देखना जग के आज रात में तुम

मेरा मुझमें बचा नही कुछ भी
ऐसे शामिल हो मेरी जात में तुम

मुझको अपना लिया मेरे गम ने
रह गये तन्हा इस हयात में तुम

बेवफा हो के बा वफा बनना।
हमसे बेहतर हो तजरबात में तुम।

मेरे जाने के बाद पाओगे
देखना खुद को मुश्किलात में तुम।

राजीव कुमार

हवा उसका बदन सहला रही है

गजल

हवा उसका बदन सहला रही है
कोई आंधी अभी सुस्ता रही है

फलक पर बिजलियां आ जा रहीं हैं
जमी ये देख कर घबरा रही है

ये कैसी भूख है इस जिन्दगी की
सभी का जिस्म खाये जा रही है

दिलों के बीच क्युं इस मुल्क में अब
कोई दीवार उठती जा रही है

बहुत बदनाम है ये मौत लेकिन।
शहीदों के लिये तोहफा रही है।

नहीं हासिल हुआ सच बोल कर कुछ
ये दुनिया सच को अब झुठला रही है

हमारे दिल में भी उल्फत है लेकिन
जिसे देखो वही ठुकरा रही है।

मेरे ख्वाबों में वो हर रोज आ कर।
मेरी नींदों को  खाये जा रही है

राजीव कुमार

दर्द भीतर से आये लागल बा।

भोजपूरी ग़ज़ल 💕

दर्द भीतर से आये लागल बा।
आह दिल के सुनाये लागल बा

हमके लागता आज कल हमके।
केहू हमसे चुराये लागल बा।

प्यार कइनी त जान गइनी हम।
केहू हमके सताये लागल बा ।

गांव के छोड़ देहनी हम लेकिन।
गांव हमके बुलाये लागल बा।

बात दिल के रोकात नइखे अब।
बात मूहे ले आये लागल बा।

रात तोहरा के देख के बिहने।
ईद सभे मनाये लागल बा।

राजीव कुमार

करोगे मुझ से शादी तो तुम्हे खुश हाल कर दुंगी

Kalicharan Singh  जी एवं नज़्म सुभाष जी   की महिला मित्र के जन्म दिन पर
हजल

करोगे मुझ से शादी तो तुम्हे खुश हाल कर दुंगी
मगर अब कहती है सर से तुम्हे बे बाल कर दूंगी
🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣

वो जो कहती थी तुमको हर खुशी दुंगी मेरे जानूं
असल में इसका मतलब था तुम्हे कंगाल कर दूंगी
😭😭😭😭😭😭😭😭😭

लगा के अपने होठों से अरे ओ लखनऊ तुझको।
दहकती जून की गर्मी में नैनीताल कर दूंगी
😘😘😘😘

नहीं बोला किसी ने मुझको हैप्पी बर्थ डे तो फिर।
मै खुद को उसकी खातिर जी का इक जंजाल कर दूंगी

🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣

अरे काली चरन जी आप गर सुधरे नहीं तो फिर ।
किसी दिन आप का बांदा जिला बंगाल कर दूंगी ।

🤣🤣🤣🤣🤣🤣

राजीव कुमार

Friday, May 25, 2018

शह्रों शह्रों हर इक मंजर थोड़ा थोड़ा देख लिया।

ताजा ग़ज़ल 

शह्रों  शह्रों  हर   इक  मंजर   थोड़ा  थोड़ा  देख  लिया।
वीरानों  के  भीतर  जा  कर  कोना  कोना   देख  लिया।

ख्वाब में  इक दिन गांव  गया था और वहां पर जाते ही।
बादल  धरती  पानी   पर्वत  जंगल  दरिया  देख   लिया।

करवट  बदले  उठकर  बैठा  फिर  थोड़ा  सा टहला भी।
तन्हाई  का  नींद   से  आखिर   मैंने   रिस्ता  देख  लिया।

सबसे  मिलना  जुलना  हस कर लेकिन खुद से रहना दूर।
ये  होता है जिस  दिन  हमने  उनका  चेहरा   देख  लिया।

लब  पर  चुप्पी  आंख  में आंसू और बिछड़ने वाला दिन।
इक  लम्हे  में  सौ-सौ  दिन  को  देखो  जीना  देख लिया।

तन्हा  कमरा सूना चौखट और घड़ी का टिक टिक टिक
 

सन्नाटों    को   आवाजों   से   बातें   करना   देख   लिया।

इक  बस्ती  के  भीतर  जलता जब  से  देखा  है  इक घर।
मत  पूछो तब  अपने भीतर  क्या क्या जलता देख लिया।

उनसे मिलता प्यार भी करता और मैं खुद को जाता भूल।
लेकिन   उससे   पहले   मैने   अपना   रस्ता  देख  लिया।

राजीव कुमार



Sunday, May 20, 2018

दिन रात गजल शेर रुबाई का फैसला

अनमोल साहब की जमीन पर 😍

दिन रात गजल शेर रुबाई का फैसला
हम कर रहे हैं दिल की दवाई का फैसला

वो सब हसीन ख्वाब जो आंखो में कैद थे
अब कर लिया है उनकी रिहाई का फैसला

फैशन में बेलिबास शह्र देख कर हमें।
लेना पड़ा अदब से विदाई का फैसला।

बस्ती में जो मकान जले बन ही  जायेंगे ।
लेकिन हो खत्म पहले लड़ाई का फैसला

ई मेल फोन काल अजी कुछ तो कीजिये।
या कर लिया है हमसे जुदाई का फैसला

जिसका भला हुआ है वो ये फैसला करे ।
किसने किया था किसकी भलाई का फैसला ।

पढ़ लिख के भी लहू ही बहाना है तो हमें ।
मंजूर नहीं ऐसी पढ़ाई का फैसला।

राजीव कुमार

Friday, May 18, 2018

गजल गोई में तब तक फायदा है

गजल गोई में तब तक फायदा है
के जब तक मेहनताना मिल रहा है

कोई महफिल की जीनत हो गयी अब।
कोई महफिल का मालिक हो गया है

भला हो फेसबुक औ वाट्सअप का।
यहां  गूंगा भी शाइर बन चुका  है ।

किसी के शान में गुस्ताखियां हैं ।
किसी का नाम ही कुछ अटपटा है।

वफा के हक में दो एक शेर पढ़ के।
गली का रोमियो भी दिलजला है।

राजीव कुमार

खाने पीने का इन्तजाम करो
जिन्दा रहने का इन्तजाम करो

मुझको सच की तलाश करनी है
कोई चखने का इन्तजाम करो।

किसको तन्हाई से महब्बत है।
इससे बचने का इन्तजाम करो ।

आधिंयां चल रही है किस जानिब।
इनके थमने का इन्तजाम करो।

चांद हासिल किसे हुआ अब तक।
जाओ सोने का इन्तजाम करो।

आप ईमानदार बन जाना ।
पहले खाने का इन्तजाम करो।

राजीव कुमार

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।

कोशिस समिक्षार्थ 🙏

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।
जब अम्नों सूकूं का इक परचम वो शक्स कहीं लहराता है।

हर बार तेरी मन की बातें बस तू ही करता जाता है।
सच पूछने वालों की आखिर किस बात से तू घबराता है।

शोहरत के दिनों में आते ही गर्दिश के दिनों को भूल गया
ये दिन भी गुजरने वाले हैं किस चीज पे तू इतराता है।

हर शक्स परेशां दिखता है हर ओर है वहशत का आलम
ऐसे में तेरी तकरीरों पर क्या तू भी कभी शर्माता है।

ये गलिंयां सड़कें चौराहे सब हाल बताने लगते हैं ।
मालूम नहीं जाने कैसा तेरा शह्र से रिस्ता-नाता है ।

ये रश्मे सियासत है तो फिर हमें सिकवा किसी से कोई नहीं।
हम जानते हैं इस पेशे में हर कोई धोखा खाता है।

राजीव कुमार

🙏🙏🙏

पग- पग में ठोकरों की डगर है कि नहीं है

ग़ज़ल
कुछ सुधार के साथ

पग- पग में  ठोकरों  की  डगर  है कि नहीं है
दुश्वार  जिन्दगी  का  सफर  है  कि  नहीं है

बस्ती को एक दिन न बियाबान बना दे
शाहों के फ़ैसले पे नज़र है कि नहीं है

हर बार रैलियों में सड़क पर हो तुमी क्यो
दावों की असलियत पे नजर है कि नहीं है।

कल शाम रोशनी को निगल बैठा अँधेरा
सूरज तुझे ज़रा भी ख़बर है कि नहीं है
 
तामीर ज़ेहन में जो कोई शह्र किये था
उस शख़्स का भी शह्र में घर है कि नहीं है

सदियों सी लम्बी रक्खी है जो एक कहानी
बतलाओ मुख़्तसर सा सफ़र है कि नहीं है

सूरज की आग अपने बदन पर लपेट कर
इंसां के हक़ में देख शजर है कि नहीं है

अपने ही दिल में ख़वाब किसी और का है क्युं
दिल टूटने  का आप  को डर है कि नहीं है।

उल्फत  में  रोजगार में रिश्तों में उलझ कर।
हर   वक्त   बेकरार  बशर है कि  नहीं  है।

राजीव कुमार

Thursday, April 19, 2018

आप कहते हैं लोग सुनते हैं।

_ग़ज़ल

आप  कहते  हैं   लोग   सुनते हैं।
हम  तो   गूंगे  है  और   बहरे  हैं।

कत्लो  गारत  फरेब  धोखे  को।
कैसे   देखेंगे   वो   जो   अंधे  हैं।

हुकमरानी  में  आप  की  साहब।
शाह  खुश  हैं  किसान  रोते  हैं ।

बेच  कर खुश  हैं लोग गैरत को।
आप  अब  तक  संम्भाले बैठे हैं।

दिल की बातें नहीं मियां हम तो।
देखिये  दिल  जबां  पे  रखते हैं।

फूल को  प्यार  तितलियों  से है।
और  पागल   यहां  के  भौरे  हैं ।

छोड़िये  क्या मिलेगा नफरत से।
शह्र ए उल्फत में आज चलते हैं।

राजीव कुमार

दौर ए गर्दिश से अब निकलना हैl

तरही ग़ज़ल 🙂

दौर ए गर्दिश से अब निकलना  हैl
अपने   हालात   को   बदलना  हैl

खुद से मिलना है इस लिये हमको
अपने  भीतर से अब निकलना हैl

इस  जमाने   में इश्क  करना  तो।
धूप   का  बर्फ   पे   टहलना   है l

आप  को  हमको  उम्र  भर देखोl
गिर के  उठना  है और  चलना हैl

अपने  हक  के  लिये  हूकूमत केl
अब   नहीं   टालने   से  टलना है।

जो   रीयाया   को   दर्द   देती   होl
ऐसी   सरकार   को   बदलना   हैl

इक   जवानी   में  ही   नहीं  यारोंl
हमको   हर  उम्र  में   संभलना है।

ये जो  ग़ज़लें  हैं इस  लिये  हैं  केl
दिल  हमारा  भी   तो  बहलना  है।

राजीव कुमार

Friday, March 9, 2018

किसी को जख्म दिखाने का दिल नहीं करता।

ग़ज़ल

किसी को जख्म दिखाने का दिल नहीं करता।
अब और अश्क बहाने का दिल नहीं करता।

वो मुझसे दूर बहुत दूर हो गया है अब ।
ये बात दिल को बताने का दिल नहीं करता।

सदाये अब भी दे रहा है घर तिरा लेकिन।
तिरा ही लौट के आने का दिल नहीं करता

इसी लिये तो भुला दी है दुश्मनी  सबसे।
किसी से कुछ भी निभाने का दिल नहीं करता

सुना के अपने गमों की ग़ज़ल किसी को भी
अब और रोने रुलाने के दिल नहीं करता।

चलो मैं कहता हूं तुम भी कहो कि तुमको भी
है इश्क और छुपाने का दिल नहीं करता।

राजीव कुमार

अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।

ग़ज़ल

मयकश तमाम मय से अन्जान हों न जाएं।
अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।

साकी शराब सागर शायर औ महफिले गम
बस नाम के ही ये सब सामान हों न जाएं ।

दैरो हरम ये मजहब इस दौर की सियासत।
सब चाहते हैं हम सब इन्सान हों न जाएं।

यूं ही किसान खुद का कातिल बना रहा तो।
इक दिन ये खेत सारे शम्शान हों न जाएं।

मिट्टी में न मिला दें मिट्टी की आबरू को ।
इस मुल्क के मुसाहिब हैवान हों न जाएं।

राजीव कुमार

इमकान- आसार, सम्भावनायें
मुसाहिब- राजा का परामर्शदाता

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...