स्याह शब को हसीं दर पे रख के आया हूँ
सहर को ओस की चादर पे रख के आया हूँ।
वो इक परिंदा जो भटका हुआ था सुब्ह से
मै आज शाम उसे घर पे रख के आया हूँ
ग़ज़ल के शेर ये नज्में ये दिल की वीरानी।
जो बुझ गया उसी मंज़र पे रख के आया हूँ
हर एक याद हर ख़याल इक हसीं दुनिया ।
तुम्हारे ख़्वाब के बिस्तर पे रख के आया हूँ
मुझे यकीन महब्बत पे था तभी शायद ।
मैं दिल को आप के खंजर पे रख के आया हूँ
क़िताब मेज घड़ी और घर की दीवारें।
मैं अपना सारा जहां घर पे रख के आया हूँ
राजीव कुमार
सहर को ओस की चादर पे रख के आया हूँ।
वो इक परिंदा जो भटका हुआ था सुब्ह से
मै आज शाम उसे घर पे रख के आया हूँ
ग़ज़ल के शेर ये नज्में ये दिल की वीरानी।
जो बुझ गया उसी मंज़र पे रख के आया हूँ
हर एक याद हर ख़याल इक हसीं दुनिया ।
तुम्हारे ख़्वाब के बिस्तर पे रख के आया हूँ
मुझे यकीन महब्बत पे था तभी शायद ।
मैं दिल को आप के खंजर पे रख के आया हूँ
क़िताब मेज घड़ी और घर की दीवारें।
मैं अपना सारा जहां घर पे रख के आया हूँ
राजीव कुमार
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