*ग़ज़ल*
2 2 1 1/2 2 1 1/2 2 12/ 12
उल्फत में किसी का भी भला हो नहीं रहा।
इस काम में अब और नफा हो नहीं रहा।
ग़म इसका नहीं शामो सहर पी रहे हैं हम।
इस बात का है ग़म कि नशा हो नहीं रहा।
इस दौर में सब झूठ के ही साथ हैं खड़े।
सच बोल कर किसी का भला हो नही रहा।
ये देख के आना पड़ा खुद के ही सामने।
कोई मेरे खिलाफ़ खङा हो नहीं रहा।
वहशत गुनाह जुल्म कज़ा और साज़िशें।
दिल्ली तेरे निज़ाम में क्या हो नहीं रहा।
कुछ काम खुद भी आप मियां कर लिया करो।
हर बात पे कहते हो चचा हो नहीं रहा।
अब सोचता हूँ छोड़ दूं ये शेरो शाइरी।
कोई भी शेर आज मेरा हो नहीं रहा।
राजीव कुमार
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उल्फत में किसी का भी भला हो नहीं रहा।
इस काम में अब और नफा हो नहीं रहा।
ग़म इसका नहीं शामो सहर पी रहे हैं हम।
इस बात का है ग़म कि नशा हो नहीं रहा।
इस दौर में सब झूठ के ही साथ हैं खड़े।
सच बोल कर किसी का भला हो नही रहा।
ये देख के आना पड़ा खुद के ही सामने।
कोई मेरे खिलाफ़ खङा हो नहीं रहा।
वहशत गुनाह जुल्म कज़ा और साज़िशें।
दिल्ली तेरे निज़ाम में क्या हो नहीं रहा।
कुछ काम खुद भी आप मियां कर लिया करो।
हर बात पे कहते हो चचा हो नहीं रहा।
अब सोचता हूँ छोड़ दूं ये शेरो शाइरी।
कोई भी शेर आज मेरा हो नहीं रहा।
राजीव कुमार
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