ग़ज़ल
लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था
दुनिया मिरे लिये थी मगर इक वही न था।
हैरत मुझे भी आज कल इस बात का है की
दिल उससे ही लगाया जो दिल से सही न था
मुश्किल भरे सफर में हमेशा हमारे साथ
देखा जो मुड़ के दोस्तों पीछे कोई न था
उसकी हर एक दीद से होता था ख़ुश मगर।
वो एक शक्स ही मेरी ख़ातिर ख़ुशी न था
ठुकरा रहा हूं देखिये हर इक सवाल को
इतना ज़हीन आज से पहले कभी न था
पीने लगा है आदमी का आदमी लहू
ऐसा तो यार आदमी पहले कभी न था
राजीव कुमार
लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था
दुनिया मिरे लिये थी मगर इक वही न था।
हैरत मुझे भी आज कल इस बात का है की
दिल उससे ही लगाया जो दिल से सही न था
मुश्किल भरे सफर में हमेशा हमारे साथ
देखा जो मुड़ के दोस्तों पीछे कोई न था
उसकी हर एक दीद से होता था ख़ुश मगर।
वो एक शक्स ही मेरी ख़ातिर ख़ुशी न था
ठुकरा रहा हूं देखिये हर इक सवाल को
इतना ज़हीन आज से पहले कभी न था
पीने लगा है आदमी का आदमी लहू
ऐसा तो यार आदमी पहले कभी न था
राजीव कुमार
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