Saturday, October 13, 2018

लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था

ग़ज़ल

लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था
दुनिया मिरे लिये थी मगर इक वही न था।

हैरत मुझे भी आज कल इस बात का है की
दिल उससे ही लगाया जो दिल से सही न था

मुश्किल भरे सफर में हमेशा हमारे साथ
देखा जो मुड़ के दोस्तों पीछे कोई न था

उसकी हर एक दीद से होता था ख़ुश मगर।
वो एक शक्स ही मेरी ख़ातिर ख़ुशी न था

ठुकरा रहा हूं देखिये हर इक सवाल को
इतना ज़हीन आज से पहले कभी न था

पीने लगा है आदमी का आदमी लहू
ऐसा तो यार आदमी पहले कभी न था

राजीव कुमार

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