ग़ज़ल -1
मैं सोचता हूं देख के अखबार की चमक।
कम हो गयी है कितनी सरोकार की चमक।
दंगे फसाद खून खाराबे के दौर में।
गुम हो न जाये आप की सरकार की चमक
इस दौर में किसान के हक के सवाल पर।
फीकी हुई है हर दफा बाजार की चमक।
इक दिन किताब और कलम से ये नौनीहाल
कर देंगे खत्म देखना हथियार की चमक
ले आओ थोङी नर्मियां लहजे में दोस्तो।
बङने लगेगी आप की गुफ्तार की चमक
दौलत की रौशनी भी चमकदार है मगर
हर इक चमक पे भारी है किरदार की चमक
राजीव कुमार
मैं सोचता हूं देख के अखबार की चमक।
कम हो गयी है कितनी सरोकार की चमक।
दंगे फसाद खून खाराबे के दौर में।
गुम हो न जाये आप की सरकार की चमक
इस दौर में किसान के हक के सवाल पर।
फीकी हुई है हर दफा बाजार की चमक।
इक दिन किताब और कलम से ये नौनीहाल
कर देंगे खत्म देखना हथियार की चमक
ले आओ थोङी नर्मियां लहजे में दोस्तो।
बङने लगेगी आप की गुफ्तार की चमक
दौलत की रौशनी भी चमकदार है मगर
हर इक चमक पे भारी है किरदार की चमक
राजीव कुमार
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