छोड़ के जब भी घर जाते हैं
हमको तन्हा कर जाते हैं
सोच रहा हूं शाम ढले तो
बेघर लोग किधर जाते है।
पैर के छाले देख के अब तो
राह के ठोकर डर जाते हैं
आप के हाथों के ये पत्थर
मेरे ही क्यूँ सर जाते हैं
वो हंसते है देख के हमको।
हम ये देख के मर जाते हैं
इश्क नहीं आसान है लेकिन
करने वाले कर जाते हैं
राजीव कुमार
हमको तन्हा कर जाते हैं
सोच रहा हूं शाम ढले तो
बेघर लोग किधर जाते है।
पैर के छाले देख के अब तो
राह के ठोकर डर जाते हैं
आप के हाथों के ये पत्थर
मेरे ही क्यूँ सर जाते हैं
वो हंसते है देख के हमको।
हम ये देख के मर जाते हैं
इश्क नहीं आसान है लेकिन
करने वाले कर जाते हैं
राजीव कुमार
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