Wednesday, August 8, 2018

महताब की चमक लगे बेकार की चमक।

ग़ज़ल-2

महताब की चमक लगे बेकार की चमक।
जब देखता हूं आप के रुख्सार की चमक।

हर एक जख्म मेरा चमकने लगा है अब।
कम हो गयी है आप की तलवार की चमक

आंखों को इन्तजार की भट्टी में झोक कर
हम चाहते हैं आप के दीदार की चमक

कहना वो आप का कि नहीं जी अभी नहीं
इनकार में है आप के इकरार की चमक।

दिल के मरीज जबसे महब्बत में हो गये।
दिखने लगी है दोस्तो अशआर की चमक।

हुस्नो हया की बात से लबरेज है गजल।
खुद बोलते हैं शेर मेरे यार की चमक।

राजीव कुमार

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