गजल
हवा उसका बदन सहला रही है
कोई आंधी अभी सुस्ता रही है
फलक पर बिजलियां आ जा रहीं हैं
जमी ये देख कर घबरा रही है
ये कैसी भूख है इस जिन्दगी की
सभी का जिस्म खाये जा रही है
दिलों के बीच क्युं इस मुल्क में अब
कोई दीवार उठती जा रही है
बहुत बदनाम है ये मौत लेकिन।
शहीदों के लिये तोहफा रही है।
नहीं हासिल हुआ सच बोल कर कुछ
ये दुनिया सच को अब झुठला रही है
हमारे दिल में भी उल्फत है लेकिन
जिसे देखो वही ठुकरा रही है।
मेरे ख्वाबों में वो हर रोज आ कर।
मेरी नींदों को खाये जा रही है
राजीव कुमार
हवा उसका बदन सहला रही है
कोई आंधी अभी सुस्ता रही है
फलक पर बिजलियां आ जा रहीं हैं
जमी ये देख कर घबरा रही है
ये कैसी भूख है इस जिन्दगी की
सभी का जिस्म खाये जा रही है
दिलों के बीच क्युं इस मुल्क में अब
कोई दीवार उठती जा रही है
बहुत बदनाम है ये मौत लेकिन।
शहीदों के लिये तोहफा रही है।
नहीं हासिल हुआ सच बोल कर कुछ
ये दुनिया सच को अब झुठला रही है
हमारे दिल में भी उल्फत है लेकिन
जिसे देखो वही ठुकरा रही है।
मेरे ख्वाबों में वो हर रोज आ कर।
मेरी नींदों को खाये जा रही है
राजीव कुमार
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