Monday, August 20, 2018

कभी ये शीशा बना और कभी बना पत्थर।

कभी ये शीशा बना और कभी बना पत्थर।
धङकता रहता हे सीने में इक पङा पत्थर

हर एक ज़ख़्म यही कहके रोता रहता है
दवा तलाश रहा था मगर मिला पत्थर।

वफा की राह में सब अपने सामने होगे।
ये जान कर ही तो सीने पे रख लिया पत्थर

लगी जो पांव से ठोकर तो हमने ये देखा
सिसक रहा था अकेले पङा पङा पत्थर

अजीब है कि सभी आईने के हक में हैं।
किसी ने पूछा नहीं किसलिए चला पत्थर

तू किस जवाब की ख़ातिर सवाल करता है
ये जान कर भी यहां पर है देवता पत्थर

वफ़ा ख़ुलूस इबादत हो चाहें चारागरी
हर एक राह में हमको फ़क़त मिला पत्थर।

राजीव कुमार 🙂

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