Saturday, August 18, 2018

ये भूल जा मेरी दस्तार गिरने वाली है।

ग़ज़ल

ये भूल जा मेरी दस्तार गिरने वाली है।
न ये गिरी थी न इस बार गिरने वाली है

ये बात तय है कि इक रोज इस जवानी की।
हर एक तौर से रफ्तार गिरने वाली है।

लहू बदन से निकलने लगा तो याद आया।
ये चीज जिस्म से बेकार गिरने वाली है

इसी लिये तो बुलंदी भी छोङ दी हमने
सुना है अज़मते कोहसार गिरने वाली है

हमारा सर है सलामत अभी तलक लेकिन
तुम्हारे हाथ से तलवार गिरने वाली है

अब और आप रुपये को गिरा नहीं सकते।
अब आप ही की ये सरकार गिरने वाली है।

राजीव कुमार
राजीव कुमार

No comments:

Post a Comment

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...