ग़ज़ल
ये भूल जा मेरी दस्तार गिरने वाली है।
न ये गिरी थी न इस बार गिरने वाली है
ये बात तय है कि इक रोज इस जवानी की।
हर एक तौर से रफ्तार गिरने वाली है।
लहू बदन से निकलने लगा तो याद आया।
ये चीज जिस्म से बेकार गिरने वाली है
इसी लिये तो बुलंदी भी छोङ दी हमने
सुना है अज़मते कोहसार गिरने वाली है
हमारा सर है सलामत अभी तलक लेकिन
तुम्हारे हाथ से तलवार गिरने वाली है
अब और आप रुपये को गिरा नहीं सकते।
अब आप ही की ये सरकार गिरने वाली है।
राजीव कुमार
राजीव कुमार
ये भूल जा मेरी दस्तार गिरने वाली है।
न ये गिरी थी न इस बार गिरने वाली है
ये बात तय है कि इक रोज इस जवानी की।
हर एक तौर से रफ्तार गिरने वाली है।
लहू बदन से निकलने लगा तो याद आया।
ये चीज जिस्म से बेकार गिरने वाली है
इसी लिये तो बुलंदी भी छोङ दी हमने
सुना है अज़मते कोहसार गिरने वाली है
हमारा सर है सलामत अभी तलक लेकिन
तुम्हारे हाथ से तलवार गिरने वाली है
अब और आप रुपये को गिरा नहीं सकते।
अब आप ही की ये सरकार गिरने वाली है।
राजीव कुमार
राजीव कुमार
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