ग़ज़ल
ये उसका फन है कि सच्चाई छीन लेता है
वो ख़्वाब देता है बीनाई छीन लेता है
ये सोच कर ही उसे याद मैं नहीं करता।
वो याद आते ही तन्हाई छीन लेता है
न बद गुमान हो सूरज की दोस्ती पर तू।
ये शाम होते ही परछाई छीन लेता है
जो अपनी जात से बाहर निकल नहीं पाता
वो अपने आप की ऊँचाई छीन लेता है
हमेशा देखा है हद से जियाद: पैसा भी।
कमाने वाले की दानाई छीन लेता है।
इसी लिये तो किनारा किया ज़माने से ।
बुराई दे के ये अच्छाई छीन लेता है।
राजीव कुमार
बीनाई - आंख की रौशनी
दानाई - बुद्धीमानी
ये उसका फन है कि सच्चाई छीन लेता है
वो ख़्वाब देता है बीनाई छीन लेता है
ये सोच कर ही उसे याद मैं नहीं करता।
वो याद आते ही तन्हाई छीन लेता है
न बद गुमान हो सूरज की दोस्ती पर तू।
ये शाम होते ही परछाई छीन लेता है
जो अपनी जात से बाहर निकल नहीं पाता
वो अपने आप की ऊँचाई छीन लेता है
हमेशा देखा है हद से जियाद: पैसा भी।
कमाने वाले की दानाई छीन लेता है।
इसी लिये तो किनारा किया ज़माने से ।
बुराई दे के ये अच्छाई छीन लेता है।
राजीव कुमार
बीनाई - आंख की रौशनी
दानाई - बुद्धीमानी
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