Thursday, September 27, 2018

किसी के कहने में सुनने में यार थोङी हूं।

ग़ज़ल

किसी के कहने में सुनने में यार थोङी हूं।
मेरे खिलाफ कोई भी नहीं है मैं ही हूं।

वही हवस है वही वहशतें वही लालच।
मैं आदमी हूं मगर आदमी भी वहसी हूं।

मिरी उङान से गुमराह तुम नहीं होना।
मै आसमान में उङते हुए भी मिट्टी हूं।

मेरे ख़याल मेरी वुसअतों से हैं बाहर
कोई न समझे मैं अपने बदन का कैदी हूँ

ये लोग जश्न मनाते हैं रोज क्युं आखिर।
मरा नहीं हूं अभी तक मैं सिर्फ जख्मी हूं।

खुशी मिलेगी नहीं तुमको जीत कर मुझसे।
मै जीतने का नहीं हारने का आदी हूं।

हमारा दिल ही नहीं जान-वान सब ले लो।
मगर कभी तो कहो जान मैं तुम्हारी हूं।

राजीव कुमार

वुसअतों - फैलाव

No comments:

Post a Comment

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...