Thursday, November 1, 2018

मेरे दिल में उतर कर आज तक देखा नहीं तुमने।

ग़ज़ल

मेरे दिल में उतर कर आज तक देखा नहीं तुमने।
समन्दर की उदासी का सबब जाना नहीं तुमने

बहुत से फ़ैसले बाक़ी हैं क़िस्मत के तुम्हारे भी।
मैं जो भी खो चुका हुं वो अभी खोया नहीं तुमने।

मुझे कुछ भी नहीं हासिल हुआ उल्फ़त कि दुनिया में।
तुम्हें कुछ तो मिला होगा कभी बोला नहीं तुमने।

सँभलने के लिये पीता तो शायद जी नहीं पाता।
बहकने का मज़ा लोगों कभी समझा नहीं तुमने ।

हुआ ज़ख़्मी जिगर कैसे लगे ये चोट कब मुझको
कोई चाक़ू छुरी ख़ंजर कभी मारा नहीं तुमने ।

मैं अक्सर चाँद-तारों से तुम्हारा ज़िक्र करता हूँ ।
शबेग़म में कभी मुझको किया तन्हा नहीं तुमने।

मुहब्बत फूल से भौरे की है बस प्यास बुझने तक।
गुज़रती क्या है फूलों पर कभी सोचा नहीं तुमने।

हमेशा गर्दिशे अय्याम में जीना पड़ा लेकिन।
ख़ुदाया साथ मेरा भी कभी छोड़ नहीं तुमने ।

मुहब्बत की लड़ाई का ज़ुदा  दस्तूर है थोड़ा।
नहीं दिल जीत सकते हो जो दिल हारा नहीं तुमने।

राजीव कुमार

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