ग़ज़ल
रूह बन कर जिस्म में जो मोजिजा मौजूद है।
अस्ल में हर शक्स के भीतर खुदा मौजूद है ।
इक महब्बत की कहानी इक मुसलसल आशिकी
मिट गये है लोग लेकिन आगरा मौजूद है।
चाहतों को दफ्न करके क्या मिला कुछ भी नहीं।
आज भी दिल में किसी का मकबरा मौजूद है।
इक सिवा खुद के सभी को देखता है दोस्तों
हर किसी की आंख में वो आईना मौजूद है
लोग कहते हैं हमारे दर्द को सुनने के बाद।
मसखरे की शक्ल में इक गमजदा मौजूद है।
जानवर इन्सां परिन्दे फूल पत्ते तितलियां।
हर किसी में शाइरी का सिलसिला मौजूद है।
राजीव कुमार
रूह बन कर जिस्म में जो मोजिजा मौजूद है।
अस्ल में हर शक्स के भीतर खुदा मौजूद है ।
इक महब्बत की कहानी इक मुसलसल आशिकी
मिट गये है लोग लेकिन आगरा मौजूद है।
चाहतों को दफ्न करके क्या मिला कुछ भी नहीं।
आज भी दिल में किसी का मकबरा मौजूद है।
इक सिवा खुद के सभी को देखता है दोस्तों
हर किसी की आंख में वो आईना मौजूद है
लोग कहते हैं हमारे दर्द को सुनने के बाद।
मसखरे की शक्ल में इक गमजदा मौजूद है।
जानवर इन्सां परिन्दे फूल पत्ते तितलियां।
हर किसी में शाइरी का सिलसिला मौजूद है।
राजीव कुमार
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