ग़ज़ल
कुछ सुधार के साथ
पग- पग में ठोकरों की डगर है कि नहीं है
दुश्वार जिन्दगी का सफर है कि नहीं है
बस्ती को एक दिन न बियाबान बना दे
शाहों के फ़ैसले पे नज़र है कि नहीं है
हर बार रैलियों में सड़क पर हो तुमी क्यो
दावों की असलियत पे नजर है कि नहीं है।
कल शाम रोशनी को निगल बैठा अँधेरा
सूरज तुझे ज़रा भी ख़बर है कि नहीं है
तामीर ज़ेहन में जो कोई शह्र किये था
उस शख़्स का भी शह्र में घर है कि नहीं है
सदियों सी लम्बी रक्खी है जो एक कहानी
बतलाओ मुख़्तसर सा सफ़र है कि नहीं है
सूरज की आग अपने बदन पर लपेट कर
इंसां के हक़ में देख शजर है कि नहीं है
अपने ही दिल में ख़वाब किसी और का है क्युं
दिल टूटने का आप को डर है कि नहीं है।
उल्फत में रोजगार में रिश्तों में उलझ कर।
हर वक्त बेकरार बशर है कि नहीं है।
राजीव कुमार
कुछ सुधार के साथ
पग- पग में ठोकरों की डगर है कि नहीं है
दुश्वार जिन्दगी का सफर है कि नहीं है
बस्ती को एक दिन न बियाबान बना दे
शाहों के फ़ैसले पे नज़र है कि नहीं है
हर बार रैलियों में सड़क पर हो तुमी क्यो
दावों की असलियत पे नजर है कि नहीं है।
कल शाम रोशनी को निगल बैठा अँधेरा
सूरज तुझे ज़रा भी ख़बर है कि नहीं है
तामीर ज़ेहन में जो कोई शह्र किये था
उस शख़्स का भी शह्र में घर है कि नहीं है
सदियों सी लम्बी रक्खी है जो एक कहानी
बतलाओ मुख़्तसर सा सफ़र है कि नहीं है
सूरज की आग अपने बदन पर लपेट कर
इंसां के हक़ में देख शजर है कि नहीं है
अपने ही दिल में ख़वाब किसी और का है क्युं
दिल टूटने का आप को डर है कि नहीं है।
उल्फत में रोजगार में रिश्तों में उलझ कर।
हर वक्त बेकरार बशर है कि नहीं है।
राजीव कुमार
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