ग़ज़ल
ऐसा लगता था बचा लेगा मगर ले डूबा।
मुझको ख़ाली पड़ा वीरान सा घर ले डूबा।
फिर वही रात वही ख़्वाब वही तन्हाई ।
मेरी आंखों को इसी बात का डर ले डूबा।
एक मंज़िल जिसे पाने की हसीं ख़्वाहिश में
इस जवानी को जवानी का सफ़र ले ढूबा
आपको चाहते रहने के सुकूं को जांना।
आप से दूर हो जाने का असर ले डूबा ।
आज सूरज ने शरारत भी कुछ ऐसे की।
सुब्ह उगते ही सितारों का क़मर ले ढूबा।
इस हकीकत को कोई कैसे छुपा सकता है ।
जिसका फल खाया वही पेड़ बश़र ले ढूबा
राजीव कुमार
ऐसा लगता था बचा लेगा मगर ले डूबा।
मुझको ख़ाली पड़ा वीरान सा घर ले डूबा।
फिर वही रात वही ख़्वाब वही तन्हाई ।
मेरी आंखों को इसी बात का डर ले डूबा।
एक मंज़िल जिसे पाने की हसीं ख़्वाहिश में
इस जवानी को जवानी का सफ़र ले ढूबा
आपको चाहते रहने के सुकूं को जांना।
आप से दूर हो जाने का असर ले डूबा ।
आज सूरज ने शरारत भी कुछ ऐसे की।
सुब्ह उगते ही सितारों का क़मर ले ढूबा।
इस हकीकत को कोई कैसे छुपा सकता है ।
जिसका फल खाया वही पेड़ बश़र ले ढूबा
राजीव कुमार
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