Saturday, August 11, 2018

बनाके शाम को हम भी गुलाब देखते हैं

बनाके शाम को हम भी गुलाब देखते हैं
हटाओ अश्क की बातें शराब देखते हैं

अब अपना जख्म किसी को नहीं दिखायेगे
ये सारे लोग हमी को खराब देखते हैं

हम ही को सारे ज़माने की फ़िक्र  है वर्ना
सुना है लोग बस अपना हिसाब देखते हैं

सियासी लोग हमारे दिनों को बदलेंगे।
हम आप दिन में मुंगेरी का ख्वाब देखते हैं

वो जिनके ख्वाब उन्हे सोने तक नहीं देते
उन्हीं को लोग यहां कामयाब देखते हैं

ये जान कर भी वही शक्स एक कातिल है
उसी में लोग मगर इन्तेखाब देखते हैं

इसी लिये तो मुकद्दर से वास्ता तोङा
हम अपने दम पे ही अपना जवाब देखते है।

राजीव कुमार

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