Friday, May 18, 2018

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।

कोशिस समिक्षार्थ 🙏

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।
जब अम्नों सूकूं का इक परचम वो शक्स कहीं लहराता है।

हर बार तेरी मन की बातें बस तू ही करता जाता है।
सच पूछने वालों की आखिर किस बात से तू घबराता है।

शोहरत के दिनों में आते ही गर्दिश के दिनों को भूल गया
ये दिन भी गुजरने वाले हैं किस चीज पे तू इतराता है।

हर शक्स परेशां दिखता है हर ओर है वहशत का आलम
ऐसे में तेरी तकरीरों पर क्या तू भी कभी शर्माता है।

ये गलिंयां सड़कें चौराहे सब हाल बताने लगते हैं ।
मालूम नहीं जाने कैसा तेरा शह्र से रिस्ता-नाता है ।

ये रश्मे सियासत है तो फिर हमें सिकवा किसी से कोई नहीं।
हम जानते हैं इस पेशे में हर कोई धोखा खाता है।

राजीव कुमार

🙏🙏🙏

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