Friday, March 9, 2018

अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।

ग़ज़ल

मयकश तमाम मय से अन्जान हों न जाएं।
अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।

साकी शराब सागर शायर औ महफिले गम
बस नाम के ही ये सब सामान हों न जाएं ।

दैरो हरम ये मजहब इस दौर की सियासत।
सब चाहते हैं हम सब इन्सान हों न जाएं।

यूं ही किसान खुद का कातिल बना रहा तो।
इक दिन ये खेत सारे शम्शान हों न जाएं।

मिट्टी में न मिला दें मिट्टी की आबरू को ।
इस मुल्क के मुसाहिब हैवान हों न जाएं।

राजीव कुमार

इमकान- आसार, सम्भावनायें
मुसाहिब- राजा का परामर्शदाता

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