ग़ज़ल
मयकश तमाम मय से अन्जान हों न जाएं।
अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।
साकी शराब सागर शायर औ महफिले गम
बस नाम के ही ये सब सामान हों न जाएं ।
दैरो हरम ये मजहब इस दौर की सियासत।
सब चाहते हैं हम सब इन्सान हों न जाएं।
यूं ही किसान खुद का कातिल बना रहा तो।
इक दिन ये खेत सारे शम्शान हों न जाएं।
मिट्टी में न मिला दें मिट्टी की आबरू को ।
इस मुल्क के मुसाहिब हैवान हों न जाएं।
राजीव कुमार
इमकान- आसार, सम्भावनायें
मुसाहिब- राजा का परामर्शदाता
मयकश तमाम मय से अन्जान हों न जाएं।
अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।
साकी शराब सागर शायर औ महफिले गम
बस नाम के ही ये सब सामान हों न जाएं ।
दैरो हरम ये मजहब इस दौर की सियासत।
सब चाहते हैं हम सब इन्सान हों न जाएं।
यूं ही किसान खुद का कातिल बना रहा तो।
इक दिन ये खेत सारे शम्शान हों न जाएं।
मिट्टी में न मिला दें मिट्टी की आबरू को ।
इस मुल्क के मुसाहिब हैवान हों न जाएं।
राजीव कुमार
इमकान- आसार, सम्भावनायें
मुसाहिब- राजा का परामर्शदाता
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