ग़ज़ल
किस्से को मैं किताब की दुनिया में ले चलूं।
अश्कों को इन्कलाब की दुनिया में ले चलूं।
खुद को तुम्हारे ख्वाब की दुनिया मे ले चलूं
जुगनू को आफताब की दुनिया में ले चलूं
तुझको तेरे सवाल पर कितना यकीन है।
आ चल तुझे जवाब की दुनिया में ले चलूं ।
उनके दयारे लब से चुरा कर कुछ एक बूंद
शबनम को अब गुलाब की दुनिया में ले चलूं
बतलाउंगा तुम्हे भी बुरा क्या है क्या भला।
खुद को तो इन्तेखाब की दुनिया में ले चलूं
चेहरा तुम्हारा देख के आता है ये ख्याल
तुमको भी माहताब की दुनिया मे ले चलूं।
सिद्दत की तिश्नगी को दिखाउगां साथ आ।
दरया तुझे सराब की दुनिया मे ले चलूँ।
किस्सा ए जिन्दगी है सिफ़र से सिफ़र तलक
सांसों को किस हिसाब की दुनिया में ले चलूं
राजीव कुमार
किस्से को मैं किताब की दुनिया में ले चलूं।
अश्कों को इन्कलाब की दुनिया में ले चलूं।
खुद को तुम्हारे ख्वाब की दुनिया मे ले चलूं
जुगनू को आफताब की दुनिया में ले चलूं
तुझको तेरे सवाल पर कितना यकीन है।
आ चल तुझे जवाब की दुनिया में ले चलूं ।
उनके दयारे लब से चुरा कर कुछ एक बूंद
शबनम को अब गुलाब की दुनिया में ले चलूं
बतलाउंगा तुम्हे भी बुरा क्या है क्या भला।
खुद को तो इन्तेखाब की दुनिया में ले चलूं
चेहरा तुम्हारा देख के आता है ये ख्याल
तुमको भी माहताब की दुनिया मे ले चलूं।
सिद्दत की तिश्नगी को दिखाउगां साथ आ।
दरया तुझे सराब की दुनिया मे ले चलूँ।
किस्सा ए जिन्दगी है सिफ़र से सिफ़र तलक
सांसों को किस हिसाब की दुनिया में ले चलूं
राजीव कुमार
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