ग़ज़ल
गांव से आकर शहर में ये मुझे अक्सर लगा
सच कहूं तो बोलती लाशों से मुझको डर लगा ।
हो कोई ऐसा भी पहलू जिन्दगी का इस तरह ।
हम जिसे जी कर कहें कि आज कुछ बेहतर लगा
हू ब हू मुझसा था लेकिन था जरा मुझसे अलग।
आईने में अक्स मेरा ही मुझे पत्थर लगा
हो मुखालिफ आजकल क्युं दोस्ती के दोस्तों।
पीठ पर क्या आप के भी है कोई खंजर लगा ।
ये हुआ हासिल वफा की राह पर चल कर हमें ।
हर किसी के हाथ का पत्थर हमारे सर लगा ।
लूट लेता है वही इस मुल्क को बतलाओ क्युं।
जो हमे और आप को इस मुल्क का रहबर लगा।
राजीव कुमार
गांव से आकर शहर में ये मुझे अक्सर लगा
सच कहूं तो बोलती लाशों से मुझको डर लगा ।
हो कोई ऐसा भी पहलू जिन्दगी का इस तरह ।
हम जिसे जी कर कहें कि आज कुछ बेहतर लगा
हू ब हू मुझसा था लेकिन था जरा मुझसे अलग।
आईने में अक्स मेरा ही मुझे पत्थर लगा
हो मुखालिफ आजकल क्युं दोस्ती के दोस्तों।
पीठ पर क्या आप के भी है कोई खंजर लगा ।
ये हुआ हासिल वफा की राह पर चल कर हमें ।
हर किसी के हाथ का पत्थर हमारे सर लगा ।
लूट लेता है वही इस मुल्क को बतलाओ क्युं।
जो हमे और आप को इस मुल्क का रहबर लगा।
राजीव कुमार
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