हर सहर धूप मेरे घर पे ठहर जाती है
ओस को ओढ़ के आंगन में बिखर जाती है
शब ए फुर्कत में मेरे साथ मेरी तन्हाई
ख्वाब बन कर मेरी आंखों में संवर जाती है।
उसके लिक्खे हुए खत आज भी जब पढता हूं
एक खुश्बू सी मेरे घर मे बिखर जाती है
खुद से मिलने का करूं कैसे इरादा यारों।
ऐसा करने में तो इक उम्र गुजर जाती है।
ये तसव्वुर का असर है या महब्बत तुसझे।
तेरी सूरत मेरी ग़ज़लों में उतर जाती है।
राजीव कुमार
ओस को ओढ़ के आंगन में बिखर जाती है
शब ए फुर्कत में मेरे साथ मेरी तन्हाई
ख्वाब बन कर मेरी आंखों में संवर जाती है।
उसके लिक्खे हुए खत आज भी जब पढता हूं
एक खुश्बू सी मेरे घर मे बिखर जाती है
खुद से मिलने का करूं कैसे इरादा यारों।
ऐसा करने में तो इक उम्र गुजर जाती है।
ये तसव्वुर का असर है या महब्बत तुसझे।
तेरी सूरत मेरी ग़ज़लों में उतर जाती है।
राजीव कुमार
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