Wednesday, October 31, 2018

हसी लबों को निगाहों को आब दे जाओ

ग़ज़ल फिलबदीह

हंसी लबों पे निगाहों में ताब दे जाओ
हमारे चेहरे को अपना नक़ाब दे जाओ

हों जिसमें दर्ज ज़माने के रंजोग़म सारे
कोई मुझे भी इक ऐसी क़िताब दे जाओ

कहाँ  चले हो सवालों के साथ तुम अपने
मेरा सवाल का पहले जवाब दे जाओ

ख़ुशी मलाल मलामत घुटन परेशानी
जो आप चाहो वो हमको जनाब दे जाओ

तुम्हारे ख़्वाब ही माँगे थे अपनी आँखों में
ये कब कहा था कि झेलम चिनाब दे जाओ

अँधेरा दिल से मिटाने को ए मिरे मालिक।
हर एक दिल को  नया आफ़ताब दे जाओ

मैं चाहता हूं ख़्यालों में आज आ कर तुम।
गजल को अपने लबों का  गुलाब दे जाओ।

राजीव कुमार

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