ताजा ग़ज़ल
शह्रों शह्रों हर इक मंजर थोड़ा थोड़ा देख लिया।
वीरानों के भीतर जा कर कोना कोना देख लिया।
ख्वाब में इक दिन गांव गया था और वहां पर जाते ही।
बादल धरती पानी पर्वत जंगल दरिया देख लिया।
करवट बदले उठकर बैठा फिर थोड़ा सा टहला भी।
तन्हाई का नींद से आखिर मैंने रिस्ता देख लिया।
सबसे मिलना जुलना हस कर लेकिन खुद से रहना दूर।
ये होता है जिस दिन हमने उनका चेहरा देख लिया।
लब पर चुप्पी आंख में आंसू और बिछड़ने वाला दिन।
इक लम्हे में सौ-सौ दिन को देखो जीना देख लिया।
तन्हा कमरा सूना चौखट और घड़ी का टिक टिक टिक
।
सन्नाटों को आवाजों से बातें करना देख लिया।
इक बस्ती के भीतर जलता जब से देखा है इक घर।
मत पूछो तब अपने भीतर क्या क्या जलता देख लिया।
उनसे मिलता प्यार भी करता और मैं खुद को जाता भूल।
लेकिन उससे पहले मैने अपना रस्ता देख लिया।
राजीव कुमार
शह्रों शह्रों हर इक मंजर थोड़ा थोड़ा देख लिया।
वीरानों के भीतर जा कर कोना कोना देख लिया।
ख्वाब में इक दिन गांव गया था और वहां पर जाते ही।
बादल धरती पानी पर्वत जंगल दरिया देख लिया।
करवट बदले उठकर बैठा फिर थोड़ा सा टहला भी।
तन्हाई का नींद से आखिर मैंने रिस्ता देख लिया।
सबसे मिलना जुलना हस कर लेकिन खुद से रहना दूर।
ये होता है जिस दिन हमने उनका चेहरा देख लिया।
लब पर चुप्पी आंख में आंसू और बिछड़ने वाला दिन।
इक लम्हे में सौ-सौ दिन को देखो जीना देख लिया।
तन्हा कमरा सूना चौखट और घड़ी का टिक टिक टिक
।
सन्नाटों को आवाजों से बातें करना देख लिया।
इक बस्ती के भीतर जलता जब से देखा है इक घर।
मत पूछो तब अपने भीतर क्या क्या जलता देख लिया।
उनसे मिलता प्यार भी करता और मैं खुद को जाता भूल।
लेकिन उससे पहले मैने अपना रस्ता देख लिया।
राजीव कुमार

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