Tuesday, December 29, 2020

दाल गेंहू आ धान ना होई

 भोजपुरी ग़ज़ल 


दाल गेंहू आ धान  ना होई 

एक दिन जब किसान ना होई


भूख देखिह सताई रतिया के 

और ओह पर बिहान ना होई


हमरे डर के तू तबले ना बुझ ब

जबले लइकी सयान ना होई


राजनीती से जेतना हम बानी 

केहू अतना हरान ना होई


माई खातिर मरे से घबराये 

कौनो अइसन जवान ना होई


जे खियावता देश के ओकर 

कबले पक्का मकान ना होई?


कर्ज माथे चढ़ल बा पहिले से

तहसे एकर निदान ना होई


जान जाई त जाई हमनी के 

एसे ज्यादा जियान ना होई 


खेत में होई ख़ुदकुशी जबले 

तबले भारत महान ना होई


राजीव कुमार

मरज चाहत का जब संगीन होगा

 मजहिया ग़ज़ल


मरज चाहत का जब संगीन होगा 

तेरा आशिक भी क्वारेन्टीन होगा


करोना जब भी होगा शाइरों को।

तुम्हारा हुस्न मेडिसीन  होगा


पकड़  खैनी तू इसको ठोक लेना

कि जब भी दिल तेरा गमगीन होगा


ग़ज़ल की लत हो जिसको यार उस पर

हमेशा बे-असर कोकीन होगा


मेरी आंखों से ज्यादा इस जमीं पर

समन्दर भी नहीं नमकीन होगा 


कबूतर आज नेता बन रहा है

इलेक्शन बाद ये शाहीन होगा


जो कुछ भी ठीक समझो कह दो अबसे

वही इस मुल्क़  का आईन होगा


राजीव

शाहीन - बाज

जिनका मकसद हमें मिटाना है।

 ग़ज़ल 


रहनुमाओं   को   अब जगाना है।

इस  लिये   इन्कलाब    लाना है।


जिनका  मकसद हमें मिटाना है।

सामने   उनके   सर   उठाना  है।


उनकी ताकत  को आजमाना है।

जुल्म सह कर  भी  मुस्कुराना है।


देखना    है    कि    बेकुसूरों  पर।

कब तलक उसको ज़ुल्म ढाना है।


तख्त और ताज छिन भी सकतें हैं

ये   शहंशाह     को    बताना   है


जो कफन सर से बांध कर निकले।

उनको   क्या  मौत   से  डराना है।


मांगने   से कभी    नहीं  मिलता। 

हक   हमें   छीन कर  ही पाना है।


उसको   लगता है  उनसे जीतेगा।

जिनको पत्थर पे गुल खिलाना है।


इस जमाने  से   ये   किसान नहीं।

इन   किसानों   से  ये   जमाना है।


राजीव कुमार

बात दिल में रोकात नईखे अब।

 भोजपुरी ग़ज़ल 


बात  दिल  में   रोकात नईखे अब।

मुह  से  लेकिन बोलात नईखे अब।


झुठ    धोखा     फरेब     बरियाई।

हमसे   कौनो   सहात   नईखे अब।


रोज  वाट्स  अप पे  मीम भेजेला।

चाहे   लईका  कमात  नईखे  अब।


बात   पर   बात     रोज   होखेला।

बात फिर    भी ओरात नईखे अब।


तीनों   टाईम    ए    देश   में  काहे।

केहू  बढ़ीयां   से  खात नईखे अब।


भूख     बेकारी      सम्प्रदायिकता।

कुछ भी  इहंवा से जात नईखे अब।


रेप    हत्या       डकैती      पेपर में।

आखिर   काहे  लिखात नईखे अब।


अउर   सम्मान    मत  दs हमरा के।

हमरे   दिल   में   समात नईखे अब।


सांच  बो लs  तsरs  त बोलs पर।

सांच  कहिंयो   सुनात   नईखे अब।

 

राजीव कुमार

Monday, November 30, 2020

जिनगी के चूल्हा के चइली ह खेती।

 जिनगी के चूल्हा के चइली ह खेती।

मत बुझिह  कागज के रद्दी ह खेती।


बोझा  त  माथे  के  पगड़ी  ह  अउरी।

हमनी  के  हाथे  के  मेहदी ह खेती।


कीमत  पसीना   के  मी ले  के  चाहीं।

फोकट  में करे  ला  थोड़ी  ह खेती।


रोपनी   सोहाई    कटाई   से  ले   के। 

चाउर  ह  आटा  ह  भूसी  ह  खेती ।


अइसन  ह ई  चाय  जीवन  के  जे में।

अदरक  ह  पत्ती  ह  चीनी  ह खेती।


खेती  किसानी    से  जे  दूर   बा   ऊ।

का  जानी  केतना  जरूरी ह  खेती।


हिम्मत  ह हर  काम  के  बाप  अउरी।

हर  कामयाबी  के   माई   ह  खेती।


राजीव कुमार


बानी हरान शहर में हर ओर देख के

 भोजपुरी ग़ज़ल 


कइसन इ हाल दे ख बनवले बा आदमी 

जियला के सुर में खुद के मुअवले बा आदमी


बानी हरान शहर में हर ओर देख के

अपने ही लाश अपने उठवले बा आदमी


लकङी के एगो कुर्सी के पावे के चाह में 

घर बार आदमी के जरवले बा आदमी


लइकन के दिनो रात मोबाइल पे देख के 

लागेला का बवाल बनवले बा आदमी


पेट्रौल  महंग हो गइल  बा खून से जादा 

अतना ले खुद भाव गिरवले बा आदमी


राजीव कुमार

किसान चमके जवान चमके युवा के मेहनत हमेशा चमके

भोजपुरी ग़ज़ल 

किसान  चमके  जवान चमके  युवा के मेहनत हमेशा चमके
बस एतने हमनी के चाह बाकि हमन के भारत हमेशा चमके

जिला  जवाड़ी  के लोग  आपस में  रहे  मिल  के हसी खुशी से।
हर एक  दिल में ए राम जी बस  इ एगो हसरत हमेशा चमके

न लोर गीरे   न भूख लागे    न भीख सड़कन   पे केहू मांगे।
हर एक लइका आ लईकियन के कुछ अइसे किस्मत हमेशा चमके

न ऊंच होखे   न  नीच  केहू  सभे  के  अवसर  मिले  बराबर 
बस इहे सपना  हमेशा देखे के दिल में  हिम्मत हमेशा चमके

जमीन  हरियर  आ  करिया  बादल  इहे  जरूरत  ए देश के बा
हे छठी माई   हमन के ऊपर    इहे इनायत    हमेशा   चमके

राजीव कुमार

Wednesday, October 14, 2020

हिन्दी औ उर्दू सी लज्ज़त पाई है।

ग़ज़ल 


हिन्दी औ उर्दू सी लज्ज़त पाई है।

भोजपुरी का लहजा दूध मलाई है। 


मोम से ज्यादा माँ कहना मीठा है पर।

माँ जी से भी ज्यादा मीठी माई है।


उसके साथ भी खाली था घर लेकिन अब।

मैं हूँ इक तस्वीर है औ तन्हाई है।


एक बुराई अपने दिल में पाल के सब।

देख रहे हैं किस किस में अच्छाई है।


रोज नयी दीवार उठाते हैं घर में ।

घरवालों के बीच में फिर भी खाई है।


हाथ में है कशकोल अभी भी बच्चों के।

ये भी अपने दौर की इक सच्चाई है ।


सीधे घर के अंदर आ जाती है दोस्त ।

बीमारी ने कुण्डी कब खङकाई है ।


घर-घर मातम फैल गया है पर अब भी।

कोरोना पर चाल हमारी ढाई है।


राजीव कुमार

कशकोल- भिक्षा पात्र

Monday, October 5, 2020

पास रहेके जब मजबूरी बढ़ जाई

 भोजपुरी ग़ज़ल


पास रहेके जब मजबूरी बढ़ जाई 

हमरे तहरे बीच के दूरी बढ़ जाई


बात बात में मुड़ी हिला के हँ कहऽ बऽ

ए आदत से जी हूजूरी बढ़ जाई


शहर पहुंच के बात समझ में इ आइल 

पेट कटी लेकिन मजदूरी बढ़ जाई


देखऽ थोङा बहुत अन्हरिया भी चाहीं 

सिर्फ अजोरा से बेनूरी बढ़ जाई


सांच कहऽ या झूठ अरे कुछ कहऽ तऽ 

होई अगर इ बात जरूरी बढ़ जाई


प्यार में जेतना बदनामी होई ओतने 

हमरे जईसन के मशहूरी बढ़ जाई 


राजीव कुमार

नफ़रत की तीरगी को मिटाने का वक़्त है।

 ग़ज़ल (Happy Independence Day)


नफ़रत की तीरगी को मिटाने का वक़्त है।

उल्फ़त की रौशनी में नहाने का वक़्त है।


हर एक दुश्मनी को भुलाने का वक़्त है।

उजड़े हुए चमन को बसाने का वक़्त है।


घर से निकल के सड़कों पे आने का वक़्त है।

ज़िन्दा हैं अब भी हम ये बताने का वक़्त है।


ख़ामोशियों को शोर बनाने का वक़्त है।

जो सो रहे हैं उनको जगाने का वक़्त है।


वहशत की आग ज़िस्म जलाने लगी है पर।

किरदार अब भी अपना बचाने का वक़्त है।


इस बेहतरीन वक़्त में किस डर से हो छुपे।

यारों यही तो जान लुटाने का वक़्त है।


मौतों का सिलसिला भी अभी तक नहीं रुका।

यानी कि ये सवाल उठाने का वक़्त है।


भूखा  गरीब  रोता  हुआ  देख  कर  लगा।

चिड़ियों के साथ बाज लड़ाने का वक़्त है।


बाघों  को जिस  तरह  से बचाने में हैं लगे।

वैसे ही  अब  ये देश  बचाने  का वक़्त है।


राजीव कुमार

कई ख्वाबों की इक तामीर है ये

 ग़ज़ल


कई ख्वाबों की इक तामीर है ये

हमारे मुल्क़  की तस्वीर है ये


तरक्की के लिये फिरका परस्ती

 समझिये पांव की जंजीर है ये


मेरी आदत है जो सच बोलने की

मेरी गर्दन पे इक शमशीर है ये


कुआँ तालाब पीपल नीम तुलसी

हमारे गांव की तस्वीर है ये


जेहालत मुफ़लिसी बेरोजगारी 

हमारी आपकी तकदीर है ये


अजीब इन्सान है दुश्मन हमारा 

हमारे ग़म से भी दिलगीर है ये

(दिलगीर-उदास)


तुम्हारा हुस्न सर से पा सरापा 

मेरी जां सच कहूं कश्मीर है ये 


वतन सबका है पर ये मत समझना

किसी के बाप की जागीर है ये


राजीव कुमार

ख़ुद के खिलाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं

 ग़ज़ल 


ख़ुद के खिलाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं 

इतना भी साफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


कहते हैं आफताब है दुनिया की नाफ़ तो

मेरे तवाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


जो सर उठा के देख सके दूर की यहाँ 

ऐसा जिराफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


सच बोलना गुनाह अगर है तो माई लार्ड 

हम सब में माफ़ कौन है कोई भी तो नही


ख़ुद को तबाह करके हसे जो मेरी तरह 

बुद्धि से हाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


राजीव कुमार


नाफ़- धूरी (जिसके चारो तरफ चक्कर  लगाते है)

तवाफ़- चक्कर लगाना

बेहतर को बेहतरीन बनाने की एक ज़िद

 ग़ज़ल 


बेहतर को बेहतरीन बनाने की एक ज़िद

आदम को है मशीन बनाने की एक ज़िद


शाइर बने तो बनते ही इस दिल में बन गयी

हर वाक़िए को सीन बनाने की एक ज़िद


नफ़रत कहीं न हमको मिटा दे सो इश्क़ पर

पैदा करो यक़ीन बनाने की एक ज़िद


हर बार तू ही साँप बनेगा तो मुझे भी 

है यार आस्तीन बनाने की एक ज़िद


इक नौजवां का नौकरी पाना इस अहद में

सागर पे है ज़मीन बनाने की एक ज़िद


चैनल हमारे मुल्क़ के पाले हुए हैं अब 

सबको तमाशबीन बनाने की एक ज़िद


शाइर गुलाम रिन्द सभी बन चुके हैं हम

ख़ुद को है अब मतीन बनाने की एक ज़िद


इक रोज मेरे बाद कहोगे जहान को

मुझमें ही थी ज़हीन बनाने की एक ज़िद


राजीव कुमार


मतीन - जिसमें मतानत हो, गंभीर, धीर, शांतचित्त, संजीदः ।

हर सम्त हो रही है क़ज़ा रोक दीजिये

 ग़ज़ल 


हर सम्त हो रही है क़ज़ा रोक दीजिये 

गर आप हैं ख़ुदा तो वबा रोक दीजिये

(क़ज़ा - मृत्यु , वबा - महामारी )


रो रो के कह रहे हैं सज़ा रोक दीजिये 

मत कीजिए हम सबको जुदा रोक दीजिये


अब और आँधियों का सितम सह न पाएगा

अब चीख़ने लगा है दिया रोक दीजिये


तन्हा रहे तो जल्द ही मर जायेगे सभी 

तन्हाई में रहने की दवा रोक दीजिये।


चाहत वफ़ा ख़ुलूस नहीं है तो न सही 

मत कीजिए अब और जफ़ा रोक दीजिये


छाई हुई हैं वहशतें पहले ही शह्र पर 

उस पर ये बारिशें ये हवा रोक दीजिये


वीरान हो रहा है महकता हुआ चमन

बेनूर हो रही है फ़ज़ा रोक दीजिये।


राजीव कुमार

खेत बगइचा गइया गोरू गांव के मंदिर पिपरा ले।

 भोजपुरी ग़जल


खेत  बगइचा  गइया  गोरू   गांव  के मंदिर पिपरा ले।

सब कुछ पूछ रहल बा जैसे लौट के अइबा कहिया ले।


रोजो    माई   बोले  सबसे  फोन  लगा  दा   बाबू   के।

आंख से हमरे लउकत नइखे फोन के अब नम्बरवा ले।


शहर   बजारे  मेला  तीरथ  घुमा  दिखा  के दुनिया के।

जहवा  पापा  चल गइलन  अब ना जा पाईब तहवा ले।


किरकेट   खेले  खातिर   हमके  रोज बोलावे सपना में।

आ   जाये लन  बिट्टू   रीशू   रिंकू   लल्ला   भोला ले।


काम  से   फुर्सत  होते  नईखीं  और कमाई पूछअ मत।

चौबिस   घंटा  दउड़त-दउड़त  फाट  गईल  बा जूता ले।


गांव   में सगरे   सोचत   बाड़ें  माल  शहर  में काटत बा।

लेकिन  आलम   ई  बा  भूखे  सुत्तल  बीया  बुचिया  ले।


हालत  जस  के  तस  ही  बाटे  खेती  और  किसानी के।

कर्ज  में  सब  कुछ  डूबल  बाटे  पैर  से  लेके कपरा ले।


गांव में अपनो काम मिलित ता केकरा के ई शौक बा ऊ।

भूखे    प्यासे    दउड़े   धूपे    बोम्बे   से   कलकत्ता   ले।


राजीव कुमार


प्रीत के रीत अइसे निभाये के बा

भोजपुरी ग़ज़ल 


प्रीत के रीत अइसे निभाये के बा

जान लागी त जानो लुटाये के बा


आंख से लोर हस के बहाये के बा 

दर्द होखी त बस मुस्कुराये के बा


सबके भीतर से भय के अन्हरिया मिटे

अइसनों ए गो दियरी जराये के बा


केहू रोये त ई देख के हो खुशी 

खुद के एतना न बाउर बनाये के बा


जिन्दगी रेत पर ऊ लिखल नाम ह 

जे के लिक्खे के बा फिर मिटाये के बा


जबले बाबू जी रहलन पते ना चलल

खर्च कइले से पहिले कमाये के बा


सिर्फ थरिया बजवला से ना होई कुछ

हर  मुसीबत से खुद के बचाये के बा 


ई बेमारी के दानव के हमनी के अब 

ढक के मुंह हाथ धो के हराये के बा


राजीव कुमार 

चौका बर्तन लकङी लवना सब पर गरहन लाग गइल

 भोजपुरी ग़ज़ल 


चौका बर्तन लकङी लवना सब पर गरहन लाग गइल

उनके घर से जाते घर के भीतर गरहन लाग गइल


फूल उगावे के फेरा में एतना कांट रोपाइल की

फुलवारी के रूप रंग के ऊपर गरहन लाग गइल


चोरी चुपके देखके उनके प्रीत के अइसन लागल रोग 

देखत देखत हमरे जान के ऊपर गरहन लाग गइल


चांद भी उनके पीछे छुप के ललचाये ला सूरज के 

और कहे ला देख ल केतना सुन्दर गरहन लाग गइल


रोज अन्हरिया रात में उनकर सपना देख के लागेला 

भोर में जैसे हमरे आंख के भीतर गरहन लाग गइल


दुनिया के ई रीत ह या फिर भगवाने के मर्जी ह 

प्रेम करे वालन के ऊपर अक्सर गरहन लाग गइल


राजीव कुमार

Saturday, August 1, 2020

जब तक हयात का ये सफ़र बरक़रार है

ग़ज़ल 

जब तक हयात का ये सफ़र बरक़रार है  
हर कोई इस जहान में इक शहसवार है

मौत आ गयी है दर पे मगर जाने क्युँ हमें।
अब भी उस एक शख़्स का ही इन्तज़ार है

कागज़ के चीथड़ों में दबा कह रहा है सच।
अख़बार और कुछ भी  नहीं इश्तिहार है

डरपोक आदमी हूँ ये सच किस तरह कहूँ
मुज़रिम तो मौज में हैं दरोगा फ़रार है

मौसम तो आम का है मगर हर जबान पर।
हैरान हूं कि अब भी करेला सवार है

दिल भी अजीब शय है इसे जितना ख़ुश रखो।
उतना ही ये लगे कि अभी सोगवार है

राजीव कुमार

शहसवार - घुड़सवार
सोगवार- दुखी

Saturday, July 18, 2020

तन्हाई का बोझ उठा लूं ग़म को गले लगा लूं मैं।

ग़ज़ल

तन्हाई  का  बोझ  उठा  लूं  ग़म  को गले लगा लूं मैं।
सोच  रहा हूं  अपने  घर  में इक घर और बसा लूं मैं।

जंगल  काटे  शह्र  बसाये  शह्र बसा कर याद आया।
गमले में  इक पेड़ लगा कर छत पर उसे सजा लूं मैं।

कैसे  घर  का  खर्च  चलेगा  सोच  रहा  था  इतने में।
हुक़्म हुआ  कि  जैसे भी हो अपना काम चला लूं मैं।

इश्क़ उसी से दिल  में वो ही और इबादत उसकी ही।
जी  करता  है  मन-मंदिर में  उसका बुत बनवालूं मैं।

ग़म का मौसम ह़िज्र का आलम रंज ख़मोशी वीरानी।
इन  कांटों  को  फूल  बना  लूं  या ग़ज़लों में ढालूं मैं।

दोस्त  पड़ोसी दफ़्तर दुनिया अपनी हर आज़ादी पर।
अब  हाकिम  ये  बोल  रहा  है  इक पहरा बैठा लूं मैं।

शह्र  के  हर  कोने में उगती वहशत देख के लगता है।
इस  जंगल  में  इक  चिंगारी  अबकी  बार  उछालूं मैं।

राजीव कुमार

Wednesday, June 10, 2020

ग़ज़ल को नूर दिया काम शाइरों को दिया।

ग़ज़ल

ग़ज़ल को नूर  दिया   काम शाइरों को दिया।
उसे तलाश करो जिसने आँसुओं को दिया।

ये  घाव  दिल  पे मुहब्बत की नेमतें समझो।
दर अस्ल ज़ख़्म वही है जो दूसरों को दिया।

बहुत  हसीन   बहुत  लाजवाब   होगी   तुम।
उसे  पता था  तभी  उसने आईनों को दिया।

दरख़्त   फूल   परिंदे    फ़ज़ाओं  की रंगत।
मुसव्विरों    ने   यही रूप  पर्वतों को दिया।

क्यूँ उसको कोई नहीँ देख सुन समझ सकता।
वो जिसने सबके लिये अपनी रहमतों को दिया।

उसी    रक़ीब  से  उम्मीद  अब  सभी  को  है।
हर एक  ज़ख़्म  यहाँ जिसने  बेबसों को दिया।

तड़पते  भूख   से   बच्चों   का  पेट  भरती है।
ज़कात  वो  नहीं  जो हमने बुतक़दों को दिया।

इसी   ज़मीन  की  मिट्टी  में   दफ़्न  है  वो  भी।
ज़मीं को बाँट के जिस शह ने सरहदों को दिया।

राजीव कुमार

मुसव्विर- चित्रकार

Sunday, May 31, 2020

तन्हाई ने मेरे अन्दर इतनी जगह बना ली है।

ग़ज़ल 

तन्हाई  ने   मेरे   अन्दर   इतनी  जगह  बना  ली  है।
दिल  बैठा है  आंख  भरी है लेकिन कमरा खाली है।

बादल की काली  चादर को ओढ़ के सूरज बैठ गया।
इस  मंजर  को  गौर  से  देखो  बारिश  होने वाली है।

दौलत  शोहरत  इश्क  इबादत   बेतर्तीबी   खुदगर्जी।
एक बुरी  लत  की  दुनियां में  सबने आदत डाली है।

सोच  रहा हूं  बैठ के  अपने  कमरे  के  इक  कोने में।
सिगरेट के इस शौक में अपने घर में आग लगा ली है।

इक-इक मुजरिम कौन पकङता इस मुश्किल में हाकिम ने।
पूरे  शह्र  को  जेल  बनाने  की  तरकीब  निकाली  है।

होटल   कैफे   माल   सिनेमा   चौराहे   और   घंटाघर। 
वीरानो   ने   इनके   भीतर   बस्ती   एक  बसा  ली  है।

दोष  किसी  का  नहीं  है लेकिन सबकी लापरवाही से।
गांव  की  रौनक चली गयी है शह्र में सबकुछ खाली है।

राजीव कुमार

Thursday, May 28, 2020

होली दिवाली ईद की नूरी तेरे बगैर

ग़ज़ल

होली  दिवाली ईद  की नूरी तेरे बगैर
हर इक ख़ुशी है आधी अधूरी तेरे बगैर

गुलशन नदी पहाङ ये फूलों पे तितलियाँ
कुछ भी नहीं है इतना  जरूरी तेरे बगैर

तेरे बगैर कैसे मुकम्मल हो जिन्दगी
जब इक गजल न हो सकी पूरी तेरे बगैर

बस दो कदम की दूरी है कालिज से घर मगर।
लगती है साठ मील की दूरी तेरे बगैर

है खुदकुशी गुनाह तो जिन्दा हूं मैं मगर
है जिन्दगी भी गैर जरूरी तेरे बगैर

बे रंग हो गया है तेरे बाद भीमताल
बेनूर  हो गयी है मसूरी तेरे बगैर

राजीव कुमार

किस मोड़ पर है जिस्त हमारी तेरे बगैर

ग़ज़ल

किस  मोड़  पर  है जिस्त हमारी तेरे बग़ैर।
लगती  है  एक  सांस  भी  भारी तेरे बग़ैर।

तुझसे मिले तो इश्क़ का पौधा पनप गया।
बिछड़े  तो वक़्त बन गया आरी तेरे बग़ैर ।

तू साथ  है  तो  जीने  में है अस्ल जायका।
वर्ना  तो  हर  मिठास  है  खारी  तेरे बग़ैर।

चाँद आज फिर उदास है ये सोच सोच कर।
कैसे    करेगा   रौशनी    जारी   तेरे   बग़ैर।

तेरी महक से रोज महकते थे जिसके फूल।
सूनी  पड़ी  है दिल की वो क्यारी तेरे बग़ैर।

आंसू   बहाये   शेर  कहे  सिगरिटें  भी  पी।
मत  पूछ   कैसे   रात   गुजारी   तेरे   बग़ैर।

तू  है  जो  मेरे  साथ  तो  है  लग्जरी हयात।
वरना   है   बोलेरो   भी  खटारी   तेरे  बग़ैर।

राजीव कुमार

भटकी हुई उदास कभी ज़िन्दगी न थी।

ग़ज़ल

भटकी   हुई   उदास  कभी  ज़िन्दगी  न थी।
इतनी  भी  बदहवास कभी  ज़िन्दगी  न थी।

पहले  भी  पुर सकून नहीं  थी ये सच है पर।
इस  दर्ज़ा  ग़म शनास  कभी ज़िन्दगी न थी।

रस्ते  पता  नहीं   है  मगर  हम  सफर  में हैं।
इस  तौर  बे   कयास  कभी  ज़िन्दगी न थी।

आईन,   इंन्तज़ाम,  शह्र,  मुल्क़ का निज़ाम।
हर  शय  से  यूं  निरास कभी ज़िन्दगी न थी।

तकलीफ़,  भूख,  प्यास, थकन मौत ले गयी।
यानी  हमारे  पास   कभी   ज़िन्दगी   न  थी।

पटरी   पे  थक  के सो गये मजदूर तब लगा।
सचमुच किसी की दास कभी ज़िन्दगी न थी।

कुछ ग़म तो कुछ खुशी से ये आधी तो थी भरी
खाली  पड़ी  गिलास  कभी  ज़िन्दगी न थी।

ये जान कर भी चलते रहे घर की ओर हम।
क़दमों  के  आस-पास कभी ज़िन्दगी न थी।

दुनिया  को  आज  देख कर ये सोचता हूं मैं।
इतनी  भी  बेलिबास  कभी  ज़िन्दगी  न थी।

राजीव कुमार

Thursday, May 21, 2020

मंज़िल के लिये कोई डगर है कि नहीं है दुश्वार ये सांसों का सफ़र है कि नहीं है

ग़ज़ल غزل

मंज़िल के लिये कोई डगर है कि नहीं है
दुश्वार ये सांसों का सफ़र है कि नहीं है

मज़दूर पे क्युं गिरती है हर दर्द की बिजली   l
दावों की हकीक़त पे नज़र है कि नहीं है।

जिस शख़्स ने इस शह्र को तामीर किया था
उस शख़्स का इस शह्र में घर है कि नहीं है l

भर पेट मयस्सर नहीं दो वक़्त की रोटी
इसकी मेरे हाकिम को ख़बर है कि नहीं है

मै धूप में बैठा हुआ ये सोच रहा हूं
कुछ मेरी दुवाओं में असर है कि नहीं है

बस्ती को बयाबान बना दे न किसी दिन l
इक़दाम ए हकूमत पे नज़र है कि नहीं  है

कल शाम उजालों को निगल बैठा अँधेराl
सूरज तुझे कुछ इसकी ख़बर है कि नहीं हैl

क्युं दिल मे सजाये हैं किसी ग़ैर के सपने
दिल टूटने  का आप  को डर है कि नहीं है।

सूरज की तपिश ओढ़ के देता है तुझे छांव ।
इंसान तेरे हक़ में शज़र है कि नहीं है l      (शजर- पेड़)

रिश्तों में महब्बत में ज़रूरत में उलझ कर
बेचैन हर इक वक़्त बशर है कि  नहीं  है।  ( बशर- इन्सान)

राजीव कुमार

जबसे दिल में उतर गयी गंगा

ग़ज़ल

जबसे दिल में उतर गयी गंगा
मैल सब मन के हर गयी गंगा

इक भगीरथ ने जब तपस्या की
आसमां से उतर गयी गंगा

घर से निकला तो मां की आंखों में
अश्क़ बन कर बिखर गयी गंगा।

सिर्फ पानी नहीं ये बोतल में।
आस्था बन के घर गयी गंगा ।

तू रविदास की निगाह से देख।
क्युं कठौती में भर गयी गंगा

खेत में जा के खुद किसानों के
 पेट दुनिया का भर गयी गंगा

उसको खुशहाली का दिया वरदान
जिस जमीं जिस नगर गयी गंगा

बहती लाशें ये गंदगी कूङे
किन अजाबों से भर गयी गंगा

जिन्दगी है ये इसकी कद्र करो
क्या करोगे जो मर गयी गंगा।

अब न संम्भले तो अगली नस्लों से
क्या कहेंगे किधर गयी गंगा।

राजीव कुमार

Friday, May 1, 2020

बैठ के तन्हा रो लेने की फिर ख़ुद को समझाने की।

ग़ज़ल

बैठ के तन्हा  रो  लेने  की  फिर  ख़ुद  को  समझाने की।
कोशिश  करके  हार  गया  हूं  दिल  से  तुम्हें भुलाने की।

मेज   किताबें   कुर्सी   बिस्तर   सारे   ऐसे   गुमसुम   हैं।
जैसे  ये   सब   देख  रहे  हों  रस्ता  आप  के  आने  की।

दिल की दुनिया शह्र का मौसम और फिज़ाओं की ख़ुश्बू।
शायद   सब   में   होड़   लगी  है  साथ  तुम्हारे जाने की।

होटों  पर  मुस्कान  सज़ा  कर  रोक लिया  है अश्क़ों को।
इस  दरिया  पर  आखिर अपनी जिद थी बांध बनाने की।

दुनिया भर के अफसानों को साथ  जो ले  कर चलता था।
अपने   पीछे   छोड़   गया   है   इक   किस्सा   विराने की।

राजीव कुमार

#मैं_शायर_तो_नहीं
#Rip #RISHI_KAPOOR

Sunday, April 26, 2020

शाइर के ख़्यालात अक़ीदत की तरह देख

ग़ज़ल

शाइर के ख़्यालात  अक़ीदत की तरह देख
गम़गीन नज़ारों को मसर्रत की तरह देख
(मसर्रत= ख़ुशी)

फूलों को कभी यार की सूरत की तरह देख
यानी की महब्बत को महब्बत की तरह देख

जंगल को क़बा नदियों पहाङों को अलंकार
धरती को अगर देख तो औरत की तरह देख
(क़बा- वस्त्र) (अलंकार-गहने)

बे रंग फज़ाओं पे उदासी की घटा को
इस शह्र में फैली हुई ख़ल्वत की तरह देख
ख़ल्वत- अकेलापन

हर एक मुसीबत से निकल जायेंगे हम लोग
पहले तू मुसीबत को मुसीबत की तरह देख

बेटों को तो सदियों से सभी देख रहे हैं
बेटी को भी तू घर की रऊनत की तरह देख।
(रऊनत- गर्व,अभिमान)

शामिल है बुजुर्गों का जहां ख़ून पसीना
उस गांव की मिट्टी को भी दौलत की तरह देख

दुनिया की हर इक चीज़ में होती है महब्बत
ये ख्वाब भी इक रोज़ हकीकत की तरह देख।

राजीव कुमार

Sunday, April 19, 2020

दुनिया के झमेलों में पड़ा चीख रहा है

ग़ज़ल
दुनिया के झमेलों में पड़ा चीख रहा है
इन्सान अंधेरों में पड़ा चीख रहा है

उस आदमी के जख़्म भी अब चीख रहे हैं
जो आप के कदमों में पड़ा चीख रहा है।

इस शह्र में सब चुप हैं मगर दोस्तों ये दिल
हम जैसों के सीनों में पड़ा चीख रहा है

सड़कों पे गरीबी का हुजूम इस लिये है की
इक आदमी महलों में पड़ा चीख रहा है

जिस ज़ुर्म पे पछता रहे हैं एक सदी से।
वो वाकिया लम्हों में पड़ा  चीख रहा है

उस शोर में हम सो ही नहीं पाते हैं शब भर 
इक ख़्वाब जो आंखों में पड़ा चीख रहा है

अखबार में सब झूठ यहां बेच रहे हैं
जो सच है वो खबरों में पड़ा चीख रहा है।

जब बोस करे शोर तो दफ़्तर में लगे यूं
इक कोयला हीरों में पड़ा चीख रहा है

लाचार हो के आप के हर एक सितम से
इक अश्क़ भी आंखों में पड़ा चीख रहा है

दीदार की उम्मीद में कमरे का कलेण्डर।
दीवार की बाहों में पड़ा चीख रहा है।

उल्फ़त की कहानी का सिला एक सदी से
राजीव की ग़ज़लों में पड़ा चीख रहा है

राजीव कुमार

Friday, April 10, 2020

जिन्दान हैं वो घर जहां आबाद हैं क़ैदी।

ग़ज़ल

जिन्दान  हैं  वो  घर  जहां  आबाद  हैं क़ैदी।
जंजीर   की  लम्बाई  तक  आज़ाद हैं क़ैदी।

तकलीफ  में वो लोग   हैं  जो क़ैद नहीं हैं।
जो  क़ैद  में   है  आज   वही   शाद हैं क़ैदी।

जिस वक़्त परिन्दों की सदा पहुंची ख़ुदा तक
उस  वक्त  से  ही  शह्र  के सय्याद हैं क़ैदी।

अल्लाह  के  इश्फ़ाक़  की  ईजाद  हैं इन्सां।
इन्सान  के   अस्क़ाम   के   ईजाद   हैं क़ैदी।
इश्फ़ाक़- दया, उदारता
अस्क़ाम-नीचता, दुष्टता

इक दौर था जब जेल का डर जेल का डर था
इस  दौर  में  तो  जेल  के  उस्ताद हैं क़ैदी।

दुनिया का ख़ुदा ख़ुद को समझने जो  लगे थे
इस  वक़्त वो  इन्सान की औलाद हैं क़ैदी।

राजीव कुमार

आंखों में रंज दिल की दुआओं मे ज़हर था।

ग़ज़ल

आंखों  में  रंज दिल की दुआओं मे ज़हर था।
शाइस्ता महफ़िलों  की फिज़ाओं में ज़हर था।

सालों से ख़ुश थे हम भी वो बरसात देखकर।
जिसमें  बरसने  वाली  घटाओं  में  ज़हर था।

तश्ना  लबी  तो  बच  गयी बस तश्ना लब मरे।
यानी  के  इस मरज की दवाओं में ज़हर था।

सिग्रेट   छोड़ने   को  हमें   कह   रहे  थे  वो।
जिनके  श़हर  की  गर्म  हवाओं में ज़हर था।

तन्हाई  जिस्म  खाने  लगी  तब  पता  चला।
हर  सम्त  घर की सूनी ख़लाओं में ज़हर था।

दिल  टूटने  के  बाद  ही  ये  जान  पाये हम।
उस  बेवफ़ा के दिल की सदाओं में ज़हर था।

चाहत वफ़ा खुलूश अना इश्क़ गैरतें
जीने की इन   हसीन  अदाओं  में  ज़हर  था।

क़िस्सा हमारे वक़्त का सुनकर कहेंगे लोग।
अच्छा !!  तुम्हारे चारों दिशाओं मे ज़हर था।

राजीव कुमार

Sunday, April 5, 2020

हमारी सांसों में चल रही है तेरी महब्बत मेरी महब्बत

ग़ज़ल

हमारी   सांसों  में  चल   रही  है  तेरी महब्बत मेरी महब्बत
हमारी   दुनिया   बदल   रही  है  तेरी महब्बत मेरी महब्बत

शब ए जुदाई के इक समन्दर की ओर आंखों से अब पिघल कर
किसी  नदी  सी  निकल रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

वो दिन का झगड़ा भी रात होते ही ख़त्म लव यू पे रोज होना
बिगड़-बिगड़ के  सम्भल रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

हरइक सितम का अजाब सह कर अभी भी क़ायम है इस लिये तो
सभी  की आंखों में खल रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

रिवायतो  के  नुकीले  ख़ंजर कदम-कदम पर जहां रखे हैं
उसी  डगर  से   निकल  रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

वही उदासी जो  साए जैसी  अजल  से पीछे पड़ी हुई थी
वही   उदासी   निगल  रही  है  तेरी महब्बत मेरी महब्बत

हैं  एक मुद्दत से क़ैद में हम, न जाने कब तक रिहाई होगी
अभी  मुसीबत में  चल रही  है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

अभी का मुझको पता नहीं है मगर ज़माना लिखेगा इक दिन
ज़माने  भर  से   डबल  रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

राजीव कुमार

सिर्फ़ सेहत नहीं बदन भी गया।

ग़ज़ल

सिर्फ़   सेहत  नहीं   बदन  भी गया।
जो  कमाया  था सारा धन भी गया।

एक   उस   गुल बदन  के  जाते ही।
लहलहाता   हुआ   चमन  भी गया।

यूं   भी  होता   है  लोस  उल्फ़त में।
क़ैच   छूटा  और  एक रन  भी गया।

पार   करते     ही    लक्ष्मण   रेखा।
यूं समझिये कि फिर हिरन भी गया।

पहले    तो  पांव    से  ज़मीन  गयी।
और   उड़ते    हुए   गगन   भी गया।

घर   से  निकले  तो  ये  समझ लेना।
आप  तो   आप  ये  वतन  भी  गया।

राजीव कुमार

जो तुमने सिखाया था वही गा रहे हैं हम

ग़ज़ल

जो तुमने सिखाया था वही गा रहे हैं हम
यानी तुम्हारा तुमको ही लौटा रहे हैं हम

क्यूँ रोज रोज हमको डराते हो मौत से
दर अस्ल पहले दिन से ही घबरा रहे हैं हम

हक़ और हूकूक क्या है अजी छोङिये जनाब
ये सारे लफ्ज़ बोल के पछता रहे हैं हम

मुर्दा दिलों के बीच में जीना है इस लिये
अपना ही ख़ून पी के जीये जा रहे हैं हम

बीमार लोग ज़हन से हैं या कि बदन से।
क्या ख़ुद से ये सवाल पूछ पा रहे हैं हम

जिस दौर में सच बोलने वाला कोई नहीं
उस दौर में सच बोल के बतला रहे हैं हम

राजीव कुमार

Tuesday, March 24, 2020

मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया

ग़ज़ल

मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया
बदन तो याद रहा और जान भूल गया

हमारी दुश्मनी बढ़ती गयी मगर इक दिन
वो अपना तीर मै अपना कमान भूल गया

यही निजाम यही तख़्त का सलीका है
लगान याद रहा पर किसान भूल गया।

अगर पता है किसी को तो मुझको बतलाये।
मैं अपने शह्र में अपना मकान भूल गया

गणित भुगोल कला और सारा लिटरेचर
तुम्हारे क्लास का हर नौजवान भूल गया

मुझे बचाओ कोई तो उसे भी समझाओ।
वो अपनी जान को ही सख्त जान भूल गया।

ये देख कर कि सभी क़ैद में हैं ख़ुश भी हैं।
उकाब ख़ौफ के मारे उड़ान भूल गया।

उसी को लोग बनाते हैं साहिबे मसनद
हमेशा दे के जो अपना बयान भूल गया।

राजीव कुमार

Saturday, March 21, 2020

नाराज़ है हलचल से ठहरा हुआ सन्नाटा

ग़ज़ल

नाराज़ है हलचल से ठहरा हुआ सन्नाटा 
हर सम्त यहां है जो फैला  हुआ सन्नाटा।

इक जंग सा ख़ुद से ही लड़ता हुआ सन्नाटा।
देखा है किसी ने क्या मरता हुआ सन्नाटा 

सच बोलने वालों के अन्ज़ाम पे हँसता  है
बस्ती में हर इक लब पे रक्खा हुआ सन्नाटा

तुम होते नहीं तब भी बस बात तुम्हारी ही
करता है मेरे घर में पसरा हुआ सन्नाटा

गम हो या ख़ुशी जो है आखों से टपक जाये 
यूं अच्छा नहीं होता ठहरा हुआ सन्नाटा।

बेचैन सा करता है हरबार  मुझे उसके 
होठों पे अचानक से बढ़ता हुआ सन्नाटा

खण्डर में इमारत की आहट पे अचानक से
दिखता है परिंदे सा उड़ता हुआ सन्नाटा

हर राज पता है पर *ख़ामोश* ही रहता है
ऐसे ही बुरा हो के अच्छा हुआ सन्नाटा

दहशत जो श़हर तक थी अब मुल्क़ में छाई है
कतरे से यूं ही देखो दरिया हुआ सन्नाटा

राजीव कुमार

Friday, March 20, 2020

वीरान दरख़्तों को यूं शाद करेंगे हम।

ग़ज़ल

वीरान   दरख़्तों  को  यूं  शाद करेंगे  हम।
पिंजरे  से  परिन्दों  को आज़ाद करेंगे हम।

इस  तरह  महब्बत  अब हम भी निभायेंगे।
जब याद  करोगी तुम तब याद करेंगे हम।

जब होगे नहीं तुम तो हर रोज ग़ज़ल लिख कर।
इस  हिज्र के मौसम को आबाद करेंगे हम।

मरना तो ग़लत होगा इक शख़्स को खोने पर।
जीने  का  नया  मक्सद  ईज़ाद  करेंगे हम।

हर रोज नया दुश्मन मुश्किल  है बना पाना।
सो  अपने लिए  ख़ुद  ही  बेदाद  करेंगे हम।
बेदाद - अत्याचार

ईमान  वफ़ा  चाहत  दुनिया  के सभी  रिश्ते।
किस-किस को तेरी ख़ातिर बर्बाद करेंगे हम।

किरदार  कहानी  का  कुछ  ऐसे  पलट  देंगे।
ओहदे   में  परिंदे   को   सय्याद  करेंगे  हम।

हर फ़ैसला जालिम के हक़ मे ही अगर होगा।
फिर किसकी अदालत में फरियाद करेंगे हम।

कहते हैं सभी मुन्सिफ़ साहब की अदालत में।
जो   आप   कहोगे  वो   उस्ताद   करेंगे  हम।

राजीव कुमार

हर एक सांस में मौक़ा दिया हंसो-खेलो।

ग़ज़ल
हर  एक  सांस  में  मौक़ा  दिया  हंसो-खेलो।
ख़ुदा ने सबको ये  तोहफा दिया हंसो-खेलो।

मैं बात कर ही रहा था कि यक-ब-यक माँ ने।
पकड़  के   हाथ  भरोसा  दिया  हंसो-खेलो।

गिला किसी  से नहीं सबसे प्यार करना तुम।
हम ही ने सबको ये नुस्ख़ा दिया हंसो-खेलो।

किसी की डोली के उठते ही लब से आई सदा।
हर  एक  बात  को  दफ़्ना  दिया हंसो-खेलो।

हमेशा  जिसने   सताया  दग़ा   किया  हमसे।
उसी  ने   ये  भी  दिलासा  दिया  हंसो-खेलो।

वफ़ा, सुलूक,  हया,  इश्क़,  शर्म  ने अब तक।
किसे  बतायें   हमें   क्या   दिया   हंसो-खेलो।

मुझे   उम्मीद   थी  बांटेगा   ग़म  मिरे  लेकिन।
ये  कह  के  उसने भी धोखा दिया हंसो-खेलो।

वो  मेरी  लाश  पे  रोया  लिपट  के और बोला।
लो  प्यार  आपको  अपना  दिया  हंसो-खेलो।

राजीव कुमार



Sunday, March 15, 2020

ग़ज़ल

हर शख़्स आज ख़ुद से ज़ुदा है कि नहीं है
आख़िर किसी को इसका पता है कि नहीं है

थोड़ा बहुत भी प्यार बचा है कि नहीं है
क्या सोचता है यार बता है कि नही है

ऐ ऊंच-नीच ज़ात-पात मानने वालों
सांसों में सबके एक हवा है कि नहीं है

दुनिया का एक ही है ख़ुदा मान लें कैसे
पैसा भी इस जहां का ख़ुदा है की नहीं है

ये जान कर भी ला-दवा हैं इश्क़ के मारे
क्यों पूछते हो इश्क़ बला है कि नहीं है

ख़ुद को तबाह जिसके लिये कर रहे हो तुम
उस शख़्स के भी दिल में वफ़ा है कि नहीं है

ये मौत रिहाई है मगर जीस्त हमारी
इक उम्र क़ैद जैसी सजा है कि नहीं है

राजीव कुमार



Wednesday, March 11, 2020

जब उसकी बात भी बेहद हुई है बातों में

ग़ज़ल

जब उसकी बात भी बेहद हुई है बातों में 
ग़ज़ल सी ख़ुश्बू बरामद हुई है बातों में

नयी रदीफ नये काफिये लिखे हमने
कि जब से आप की आमद हुई है बातों में

वो जिसके काम का कोई भी एतबार नहीं
उसी की ख़ूब ख़ुशामद हुई है बातो में

अदब ने रोक लिया इस लिये रुके वरना
हमारी आप की कब हद हुई है बातों में

बगैर उसके मुकम्मल कोई भी बात कहां
वो जब से साहिबे मसनद हुई है बातों में

तेरी खुशी से पता चल रहा है कि उससे
वो एक बात भी शायद हुई है बातों में

राजीव कुमार

वो अलग बात है हम सबकी हिफाज़त न करो

ग़ज़ल

वो अलग बात है हम सबकी हिफाज़त न करो
पर गुज़ारिश है कि हर बात पे धत-धत न करो

धर्म और ज़ात की बुनियाद पे निस्बत न करो
ऐसा करना है तो फिर हम पे हकूमत न करो

कुछ गलत है तो उठो और उठा लो परचम
बैठ कर मुल्क़ की हर रोज शिक़ायत न करो

जह्र नफ़रत का कहीं भर के मिटा दे न हमें
ऐसे कानून की अब कोई हिमायत न करो

मिल के लोगों से ज़रा बात करो परखो भी
देख के शक़्ल किसी से भी रिफाक़त न करो

ये सियासत है सियासत में सगा कोई नहीं
आप बे वजह किसी शाह की बैअत न करो

अपनी मिट्टी से ज़ुदा हो ही नहीं सकते हम
ऐसा करने की सुनो आप भी हिम्मत न करो

राजीव कुमार

रिफाक़त- दोस्ती
बैअत - स्वामिभक्ति

हर एक ज़ुल्म को बेजान करने वाला हूँ

ग़ज़ल

हर एक ज़ुल्म को बेजान करने वाला हूँ
मै अपने आप को चट्टान करने वाला हूँ।

हर एक ख़्वाब हकीकत में ढाल के इक दिन
हर एक शख़्स को हैरान करने वाला हूँ

फक़त बदन ही नहीं इक दफा तू कह दे तो
मैं अपनी जान तुझे दान करने वाला हूं।

मेरे खिलाफ़ मेरी ही अना है सो खुद से।
अब एक जंग का ऐलान करने वाला हूँ।

है वक्त अब भी अगर चाहो तो निकल जाओ।
मैं दिल को आज से जिन्दान करने वाला हूँ।

वफ़ा खूलूश दगा दर्द दीन और ईमाँ
तमाम मुश्किलें आसान करने वाला हूँ।

ख़ुशी है शह्र बसाने की पर ये गम़ भी है।
मैं अपने गांव को वीरान करने वाला हूँ।

राजीव कुमार

जिन्दान- क़ैद

मुझसे हर रोज गिला करती है

ग़ज़ल

मुझसे हर रोज गिला करती है
पर मेरे हक़ में दुआ करती है

इक अजीयत सी हवा करती है
जब चरागों से मिला करती है

मेरे ख़्वाबों के हसीं गार्डन में।
हर सुबह वाक किया करती है।

उसकी तस्वीर मेरे कमरे को।
उसकी ख़ुश्बू से भरा करती है

दोस्त कलतक थी मगर कल से ही
वो मेरी जान हुआ करती है

हुस्न जो काम नहीं कर पाती।
हां वही काम अदा करती है

भर चुके हैं जो उन्हीं जख्मों को
शाइरी रोज हरा  करती है

राजीव कुमार

उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर



उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर
रहना है अब शराब से दो चार कदम दूर

उसकी गली में आके हमे लग रहा है की
हम भी है माहताब से दो चार कदम दूर

कटते रहे शज़र तो इन्हीं गर्मीयों में दोस्त
हम होंगे आफताब से दो चार कदम दूर

सहरा ए इज्तिराब के हम आ गये हैं पास
जब भी हुए खिताब से दो चार कदम दूर

हमने बनाया जिसको हमारा जवाबदेह
वो ही है हर जवाब से दो चार कदम दूर

हमको दिखा के फूल जो बोते रहे हैं खार
रहिये उन्ही जनाब से दो चार कदम दूर।

राजीव कुमार
गुराब- अहम

हर तरफ जह्र सी तासीर नज़र आती है

ग़ज़ल

हर तरफ जह्र सी तासीर नज़र आती है
स्थिती शह्र की  गम्भीर  नज़र आती है।

Har taraf jahar si tashir nazar aati hai
Isthiti sahar ki gammbhir nazar aati hai

आलम ए रंज ये वहशत ये सभी जलते घर
खून सी ख़ल्क़ की तस्वीर नज़र आती  है

Alam e ranj ye vahashat ye sabhi jalte ghar
Khoon si khalk ki tashvir nazar aati hai

ये तरक्की या तबाही है? हमें बतलाओ
क्युं हर इक हाथ में शमशीर नज़र आती  है

Ye tarakki ya tabahi hai hume batlao
Kyun har ik hath main shamshir nazar aati hai

मेरे साये की तरह साथ हर इक रस्ते पर
मौत जैसे कोई रहगीर नज़र आती है

Mere saaye ki tarah sath har ik rashtey per
Mout jaise koi rahgir nazar aati hai

गांव से शह्र में जाता हूं तो मां की सूरत
हर दफा पांव की जंजीर नज़र आती  है

Gaon se sahar main jata hun to maa ki surat
Har dafa paon ki janzeer nazar aati hai

दिल मेरा था भी नहीं थी तो बस इक जां अपनी
वो भी इक शख़्स की जागीर नज़र आती है

Dil mera tha bhi nahi thi to bas ik jan apni
Wo bhi ik shakhs ki jagir nazar aati hai

उसका लहजा है तरन्नुम में ग़ज़ल कहने सा
वो किसी नज़्म की ताबीर नज़र आती है

Uska lahza hai tarannum main ghazal kahne sa
Wo kisi nazm ki tabir nazar aati hai

राजीव कुमार

ख़ल्क़- मानवता

जरूरत से ज़ियादा कर रहा हूँ।

ग़ज़ल

जरूरत से ज़ियादा कर रहा हूँ।
मैं दुश्मन पर भरोसा कर रहा हूँ।

न पूछो आज कल क्या कर रहा हूँ।
मज़ा उल्फ़त का दूना कर रहा हूँ।

मैं हर इक सांस में जीने की ख़ातिर
हवा से अपना सौदा कर रहा हूँ।

तेरी तस्वीर सीने से लगा कर
मैं धड़कन दिल में पैदा कर रहा हूँ।

महब्बत बे असर होती है जिस पर
हर उस शय से किनारा कर रहा हूँ।

कोई सुनता नहीं है प्यार से अब
सो मैं भी तल्ख लहजा कर रहा हूँ।

मैं ख़ुद से लड़ नहीं पाता हूँ लेकिन
ज़माने भर से झगड़ा कर रहा हूँ।

जो दिल में था अधूरापन अभी तक
उसे ग़ज़लों से पूरा कर रहा हूँ।

राजीव कुमार

अपनी गली से उसकी डगर जा रहे हैं हम यानी कि आज पंत नगर जा रहे हें हम

अपनी गली से उसकी डगर जा रहे हैं हम
यानी कि आज पंत नगर जा रहे हें हम

उसकी अलग है बात अलग उसका रंग है
वो जिसके लिये छोड़ के घर जा रहे हैं हम

राजीव

इक बात कहूं ये जो ईमान सरीखा था। दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

ग़ज़ल

इक  बात   कहूं  ये  जो  ईमान सरीखा था।
दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

आजाद समझते थे जिस शह्र में अपने को।
वो शह्र  की  सूरत  में  जिन्दान सरीखा था।

उस शख़्स की मिट्टी भी मिट्टी में मिली आख़िर।
खुद अपनी नज़र में जो भगवान सरीखा था।

इस भागती दुनिया में देखा जो ठहर कर तो।
अपने सा  लगा  वो जो अन्जान सरीखा था।

नादान  है  ये  दुनिया  कहती है उसे अच्छा।
जो  शख़्स  हकीक़त  में  शैतान सरीखा था।

नफ़रत ने बिगाड़ी है इस मुल्क़ की सूरत को।
वरना तो  वतन अपना  गुलदान सरीखा था।

हर  बार  के  जैसे   ही  वो  मेरी  तबाही पर।
हैरां   तो   नहीं   था  पर  हैरान  सरीखा था।

हिन्दु  था  मुसलमां  था  मालूम  नहीं  लेकिन।
जो  ख़त्म  हुआ  था  वो  इन्सान सरीखा था।

राजीव कुमार

जिन्दान - जेल

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।
आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे

जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी
मोहन के साथ ख़्वाब में राधा दिखाई दे

शाइर की आह ठीक है पर शेर है वही
कागज पे हर्फ-हर्फ तङपता दिखाई दे

बीनाई को मेरी ये असर दे मेरे खुदा
जब भी खुले ये आंख सवेरा दिखाई दे

दावा हर एक आप का मानेंगे हम मगर
पूरा कोई तो आप का वादा दिखाई दे

मजबूर कर रहा है ज़माना हमें की हम
सच्चा कहें उसी को जो झूठा दिखाई दे

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...