Thursday, May 21, 2020

जबसे दिल में उतर गयी गंगा

ग़ज़ल

जबसे दिल में उतर गयी गंगा
मैल सब मन के हर गयी गंगा

इक भगीरथ ने जब तपस्या की
आसमां से उतर गयी गंगा

घर से निकला तो मां की आंखों में
अश्क़ बन कर बिखर गयी गंगा।

सिर्फ पानी नहीं ये बोतल में।
आस्था बन के घर गयी गंगा ।

तू रविदास की निगाह से देख।
क्युं कठौती में भर गयी गंगा

खेत में जा के खुद किसानों के
 पेट दुनिया का भर गयी गंगा

उसको खुशहाली का दिया वरदान
जिस जमीं जिस नगर गयी गंगा

बहती लाशें ये गंदगी कूङे
किन अजाबों से भर गयी गंगा

जिन्दगी है ये इसकी कद्र करो
क्या करोगे जो मर गयी गंगा।

अब न संम्भले तो अगली नस्लों से
क्या कहेंगे किधर गयी गंगा।

राजीव कुमार

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