ग़ज़ल
जबसे दिल में उतर गयी गंगा
मैल सब मन के हर गयी गंगा
इक भगीरथ ने जब तपस्या की
आसमां से उतर गयी गंगा
घर से निकला तो मां की आंखों में
अश्क़ बन कर बिखर गयी गंगा।
सिर्फ पानी नहीं ये बोतल में।
आस्था बन के घर गयी गंगा ।
तू रविदास की निगाह से देख।
क्युं कठौती में भर गयी गंगा
खेत में जा के खुद किसानों के
पेट दुनिया का भर गयी गंगा
उसको खुशहाली का दिया वरदान
जिस जमीं जिस नगर गयी गंगा
बहती लाशें ये गंदगी कूङे
किन अजाबों से भर गयी गंगा
जिन्दगी है ये इसकी कद्र करो
क्या करोगे जो मर गयी गंगा।
अब न संम्भले तो अगली नस्लों से
क्या कहेंगे किधर गयी गंगा।
राजीव कुमार
जबसे दिल में उतर गयी गंगा
मैल सब मन के हर गयी गंगा
इक भगीरथ ने जब तपस्या की
आसमां से उतर गयी गंगा
घर से निकला तो मां की आंखों में
अश्क़ बन कर बिखर गयी गंगा।
सिर्फ पानी नहीं ये बोतल में।
आस्था बन के घर गयी गंगा ।
तू रविदास की निगाह से देख।
क्युं कठौती में भर गयी गंगा
खेत में जा के खुद किसानों के
पेट दुनिया का भर गयी गंगा
उसको खुशहाली का दिया वरदान
जिस जमीं जिस नगर गयी गंगा
बहती लाशें ये गंदगी कूङे
किन अजाबों से भर गयी गंगा
जिन्दगी है ये इसकी कद्र करो
क्या करोगे जो मर गयी गंगा।
अब न संम्भले तो अगली नस्लों से
क्या कहेंगे किधर गयी गंगा।
राजीव कुमार
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