ग़ज़ल
हर सम्त हो रही है क़ज़ा रोक दीजिये
गर आप हैं ख़ुदा तो वबा रोक दीजिये
(क़ज़ा - मृत्यु , वबा - महामारी )
रो रो के कह रहे हैं सज़ा रोक दीजिये
मत कीजिए हम सबको जुदा रोक दीजिये
अब और आँधियों का सितम सह न पाएगा
अब चीख़ने लगा है दिया रोक दीजिये
तन्हा रहे तो जल्द ही मर जायेगे सभी
तन्हाई में रहने की दवा रोक दीजिये।
चाहत वफ़ा ख़ुलूस नहीं है तो न सही
मत कीजिए अब और जफ़ा रोक दीजिये
छाई हुई हैं वहशतें पहले ही शह्र पर
उस पर ये बारिशें ये हवा रोक दीजिये
वीरान हो रहा है महकता हुआ चमन
बेनूर हो रही है फ़ज़ा रोक दीजिये।
राजीव कुमार
No comments:
Post a Comment