Sunday, April 5, 2020

हमारी सांसों में चल रही है तेरी महब्बत मेरी महब्बत

ग़ज़ल

हमारी   सांसों  में  चल   रही  है  तेरी महब्बत मेरी महब्बत
हमारी   दुनिया   बदल   रही  है  तेरी महब्बत मेरी महब्बत

शब ए जुदाई के इक समन्दर की ओर आंखों से अब पिघल कर
किसी  नदी  सी  निकल रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

वो दिन का झगड़ा भी रात होते ही ख़त्म लव यू पे रोज होना
बिगड़-बिगड़ के  सम्भल रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

हरइक सितम का अजाब सह कर अभी भी क़ायम है इस लिये तो
सभी  की आंखों में खल रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

रिवायतो  के  नुकीले  ख़ंजर कदम-कदम पर जहां रखे हैं
उसी  डगर  से   निकल  रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

वही उदासी जो  साए जैसी  अजल  से पीछे पड़ी हुई थी
वही   उदासी   निगल  रही  है  तेरी महब्बत मेरी महब्बत

हैं  एक मुद्दत से क़ैद में हम, न जाने कब तक रिहाई होगी
अभी  मुसीबत में  चल रही  है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

अभी का मुझको पता नहीं है मगर ज़माना लिखेगा इक दिन
ज़माने  भर  से   डबल  रही है तेरी  महब्बत मेरी महब्बत

राजीव कुमार

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