Thursday, May 21, 2020

मंज़िल के लिये कोई डगर है कि नहीं है दुश्वार ये सांसों का सफ़र है कि नहीं है

ग़ज़ल غزل

मंज़िल के लिये कोई डगर है कि नहीं है
दुश्वार ये सांसों का सफ़र है कि नहीं है

मज़दूर पे क्युं गिरती है हर दर्द की बिजली   l
दावों की हकीक़त पे नज़र है कि नहीं है।

जिस शख़्स ने इस शह्र को तामीर किया था
उस शख़्स का इस शह्र में घर है कि नहीं है l

भर पेट मयस्सर नहीं दो वक़्त की रोटी
इसकी मेरे हाकिम को ख़बर है कि नहीं है

मै धूप में बैठा हुआ ये सोच रहा हूं
कुछ मेरी दुवाओं में असर है कि नहीं है

बस्ती को बयाबान बना दे न किसी दिन l
इक़दाम ए हकूमत पे नज़र है कि नहीं  है

कल शाम उजालों को निगल बैठा अँधेराl
सूरज तुझे कुछ इसकी ख़बर है कि नहीं हैl

क्युं दिल मे सजाये हैं किसी ग़ैर के सपने
दिल टूटने  का आप  को डर है कि नहीं है।

सूरज की तपिश ओढ़ के देता है तुझे छांव ।
इंसान तेरे हक़ में शज़र है कि नहीं है l      (शजर- पेड़)

रिश्तों में महब्बत में ज़रूरत में उलझ कर
बेचैन हर इक वक़्त बशर है कि  नहीं  है।  ( बशर- इन्सान)

राजीव कुमार

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