Wednesday, March 11, 2020

उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर



उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर
रहना है अब शराब से दो चार कदम दूर

उसकी गली में आके हमे लग रहा है की
हम भी है माहताब से दो चार कदम दूर

कटते रहे शज़र तो इन्हीं गर्मीयों में दोस्त
हम होंगे आफताब से दो चार कदम दूर

सहरा ए इज्तिराब के हम आ गये हैं पास
जब भी हुए खिताब से दो चार कदम दूर

हमने बनाया जिसको हमारा जवाबदेह
वो ही है हर जवाब से दो चार कदम दूर

हमको दिखा के फूल जो बोते रहे हैं खार
रहिये उन्ही जनाब से दो चार कदम दूर।

राजीव कुमार
गुराब- अहम

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