ग़ज़ल
हर शख़्स आज ख़ुद से ज़ुदा है कि नहीं है
आख़िर किसी को इसका पता है कि नहीं है
आख़िर किसी को इसका पता है कि नहीं है
थोड़ा बहुत भी प्यार बचा है कि नहीं है
क्या सोचता है यार बता है कि नही है
क्या सोचता है यार बता है कि नही है
ऐ ऊंच-नीच ज़ात-पात मानने वालों
सांसों में सबके एक हवा है कि नहीं है
सांसों में सबके एक हवा है कि नहीं है
दुनिया का एक ही है ख़ुदा मान लें कैसे
पैसा भी इस जहां का ख़ुदा है की नहीं है
पैसा भी इस जहां का ख़ुदा है की नहीं है
ये जान कर भी ला-दवा हैं इश्क़ के मारे
क्यों पूछते हो इश्क़ बला है कि नहीं है
क्यों पूछते हो इश्क़ बला है कि नहीं है
ख़ुद को तबाह जिसके लिये कर रहे हो तुम
उस शख़्स के भी दिल में वफ़ा है कि नहीं है
उस शख़्स के भी दिल में वफ़ा है कि नहीं है
ये मौत रिहाई है मगर जीस्त हमारी
इक उम्र क़ैद जैसी सजा है कि नहीं है
इक उम्र क़ैद जैसी सजा है कि नहीं है
राजीव कुमार

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