Friday, May 1, 2020

बैठ के तन्हा रो लेने की फिर ख़ुद को समझाने की।

ग़ज़ल

बैठ के तन्हा  रो  लेने  की  फिर  ख़ुद  को  समझाने की।
कोशिश  करके  हार  गया  हूं  दिल  से  तुम्हें भुलाने की।

मेज   किताबें   कुर्सी   बिस्तर   सारे   ऐसे   गुमसुम   हैं।
जैसे  ये   सब   देख  रहे  हों  रस्ता  आप  के  आने  की।

दिल की दुनिया शह्र का मौसम और फिज़ाओं की ख़ुश्बू।
शायद   सब   में   होड़   लगी  है  साथ  तुम्हारे जाने की।

होटों  पर  मुस्कान  सज़ा  कर  रोक लिया  है अश्क़ों को।
इस  दरिया  पर  आखिर अपनी जिद थी बांध बनाने की।

दुनिया भर के अफसानों को साथ  जो ले  कर चलता था।
अपने   पीछे   छोड़   गया   है   इक   किस्सा   विराने की।

राजीव कुमार

#मैं_शायर_तो_नहीं
#Rip #RISHI_KAPOOR

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